ऋ॒ज्रावि॑न्द्रो॒त आ द॑दे॒ हरी॒ ऋक्ष॑स्य सू॒नवि॑ । आ॒श्व॒मे॒धस्य॒ रोहि॑ता ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ṛjrāv indrota ā dade harī ṛkṣasya sūnavi | āśvamedhasya rohitā ||
पद पाठ
ऋ॒ज्रौ । इ॒न्द्रो॒ते । आ । द॒दे॒ । हरी॒ इति॑ । ऋक्ष॑स्य । सू॒नवि॑ । आ॒श्व॒ऽमे॒धस्य॑ । रोहि॑ता ॥ ८.६८.१५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:68» मन्त्र:15
| अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:3» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:15
0 बार पढ़ा गया
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् (नः+तन्वे) हमारे शरीर या पुत्र के लिये (उरु+कृधि) बहुत सुख दो, (तने) हमारे पौत्र के लिये बहुत सुख दो, (नः+क्षयाय+कृधि) हमारे निवास के लिये कल्याण करो, (नः+जीवसे) हमारे जीवन के लिये (उरु+यन्धि) बहुत सुख दो ॥१२॥
भावार्थभाषाः - क्षय=वैदिक भाषा में क्षय शब्द निवासार्थक है। यन्धि=यम धातु दानार्थक है। आशय इसका यह है कि हम शुभ कर्म करें, अवश्य उसका फल सुख मिलेगा ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्रोत, ऋक्षसूनु आश्वमेघ
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रोत) = [इन्द्र+उत] प्रभु से रक्षित व्यक्ति में (ऋजौ) = ऋजुगामी जो इन्द्रियाश्व हैं, उनको (आददे) = मैं ग्रहण करता हूँ। प्रभु के उपासक के ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्व सरल मार्ग से चलनेवाले होते हैं। मैं भी इन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करता हूँ। [२] (ऋक्षस्य) = गतिशील पुरुष के [ऋष् गतौ] (सूनवि) = पुत्र में, अर्थात् अत्यन्त गतिशील में जो (हरी) = हमें लक्ष्यस्थान पर पहुँचानेवाले इन्द्रियाश्व हैं, उन्हें मैं प्राप्त करता हूँ। [३] (आश्वमेधस्य) = अश्वमेध के पुत्र अर्थात् उत्कृष्ट अश्वमेध [अश्नुते इति अश्व:] - सर्वव्यापक प्रभु के साथ मेल करनेवाले के [मेधू संगमे] (रोहिता) = तेजस्वी [लालवर्ण के] इन्द्रियाश्वों को मैं प्राप्त करता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु से रक्षित गतिशील पुरुष के इन्द्रियाश्व ऋजुगामी व लक्ष्यस्थान पर पहुँचानेवाले होते हैं। सर्वव्यापक प्रभु के साथ मेलवाला पुरुष इन्द्रियाश्वों को तेजस्वी बनाता है।
0 बार पढ़ा गया
शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् ! नः=अस्माकम्। तन्वे=शरीराय=शरीरजाय पुत्राय वा। उरु=विस्तीर्णं बहु च सुखं कुरु। तने=पौत्राय च। उरु=बहु सुखं कुरु। नोऽस्माकम्। क्षयाय=निवासाय कल्याणम्। कृधि। नोऽस्माकम्। जीवसे=जीवनाय। उरु=सुखम्। यन्धि=यच्छ देहि ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - I have got two sensitive and dynamic organs of communication protected and promoted by Indra for the body form of the spirit and for efficient working of the body system.
