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उप॑ मा॒ षड्द्वाद्वा॒ नर॒: सोम॑स्य॒ हर्ष्या॑ । तिष्ठ॑न्ति स्वादुरा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa mā ṣaḍ dvā-dvā naraḥ somasya harṣyā | tiṣṭhanti svādurātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑ । मा॒ । षट् । द्वाऽद्वा॑ । नरः॑ । सोम॑स्य । हर्ष्या॑ । तिष्ठ॑न्ति । स्वा॒दु॒ऽरा॒तयः॑ ॥ ८.६८.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:68» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:14


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! (यस्य+ते) जिस तेरी (सख्यम्) मैत्री (स्वादु) अत्यन्त प्रिय और रसवती है। (अद्रिवः) हे संसारोत्पादक ! (प्रणीतिः) तेरी जगद्रचना भी (स्वाद्वी) मधुमयी है। इस कारण तेरी स्तुति प्रार्थना के लिये (यज्ञः) शुभकर्म (वितन्तसाय्यः) अवश्य और सदा कर्तव्य और विस्तारणीय है ॥११॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर के साथ प्रेम या भक्ति से क्या आनन्द प्राप्त होता है, इसको कोई योगी ध्यानी और ज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं, उसका प्रेम मधुमय है। हे मनुष्यों ! उसकी भक्ति करो ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

षड् स्वादुरातयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सप्तर्षियों में 'दो कान, दो नासिका छिद्र तथा दो आँखें'- ये दो के तीन युग्म हैं। ये सब ('नरः') [नृ नये] = हमें आगे और आगे ले चलनेवाले हैं। ये (द्वाद्वा) = दो-दो के तीन युग्म, इस प्रकार (षड्-छः नरः) = उन्नति पथ पर ले चलनेवाले ऋषि (मा उप तिष्ठन्ति) = मेरे समीप स्थित होते हैं। प्रभु के अनुग्रह से ये ६ ऋषि हमें प्राप्त हुए हैं। [२] (सोमस्य) = सोमरक्षण से उत्पन्न (हर्ष्या) = हर्ष से ये ऋषि स्वादुरातयः = जीवन को मधुर बनानेवाले ज्ञान को देनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ने हमें 'दो कान, दो आँख, दो नासिकाछिद्र और मुख' ये सात ऋषि प्राप्त कराए हैं। सोमरक्षण से हृष्ट (हृषत) हुए - हुए ये ऋषि मधुर ज्ञान को हमारे लिए प्राप्त कराते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! यस्य+ते=तव। सख्यं=सखित्वम्। स्वादु=रसवद्वर्तते। हे अद्रिवः=हे संसारकर्तः ! तव प्रणीतिः=प्रणयनं जगतः। स्वाद्वी=मधुमती। अतस्त्वां स्तोतुम्। यज्ञः शुभकर्म। वितन्तसाय्यः=विस्तारणीयः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the ecstasy of soma joy and exhilaration of achievement, six in twos come to me, leading lights they are, abundant and delightful are their gifts and contributions.