देवता: आदित्याः
ऋषि: मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः
छन्द: गायत्री
स्वर: षड्जः
यद्व॑: श्रा॒न्ताय॑ सुन्व॒ते वरू॑थ॒मस्ति॒ यच्छ॒र्दिः । तेना॑ नो॒ अधि॑ वोचत ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yad vaḥ śrāntāya sunvate varūtham asti yac chardiḥ | tenā no adhi vocata ||
पद पाठ
यत् । वः॒ । श्रा॒न्ताय॑ । सु॒न्व॒ते । वरू॑थम् । अस्ति॑ । यत् । छ॒र्दिः । तेन॑ । नः॒ । अधि॑ । वो॒च॒त॒ ॥ ८.६७.६
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:67» मन्त्र:6
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:52» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:6
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (दाशुषे) जो लोग प्रजा के कार्य्य में अपना समय, धन, बुद्धि, शरीर और मन लगाते हैं, वे दाश्वान् कहलाते हैं और (अरंकृते) जो अपने सदाचारों से प्रजाओं को भूषित रखते हैं और प्रत्येक कार्य्य में जो क्षम हैं, वे अलंकृत कहाते हैं। इस प्रकार मनुष्यों के लिये (तेषाम्+हि+आदित्यानाम्) उन सभासदों का (चित्रम्) बहुविध (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (वरूथम्) दान, सत्कार, पुरस्कार पारितोषिक और धन आदि होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो राष्ट्र के उच्चाधिकारी हों, वे सदा उपकारी जनों में इनाम बाँटा करें। इससे देश की वृद्धि होती जाती है। केवल अपने स्वार्थ में कदापि भी मग्न नहीं होना चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
श्रान्ताय सुन्वते
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जो (वः) = आपका (श्रान्ताय) = श्रमशील व्यक्ति के लिए और (सुन्वते) = शरीर में सोम का सवन करनेवाले पुरुष के लिए (वरूथम्) = धन (अस्ति) = है, इसके लिए (यत्) = जो आपका (छर्दिः) = गृह है, (तेन) = उस धन व गृह के हेतु से (नः) = हमें (अधिवोचत) = आधिक्येन उपदेश हो । [२] आदित्य विद्वानों से ज्ञान को प्राप्त करके हम श्रमशील व सोम का रक्षण करनेवाले बनते हैं। ये श्रम व सोमरक्षण हमें उत्तम धन व गृहवाला बनाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आदित्य विद्वान् हमें ज्ञान देकर श्रम व सोमरक्षण का महत्त्व समझाते हैं। ये बातें हमें उत्तम धन व गृह प्राप्त कराती हैं।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - दाशुषे=दत्तवते=समयादिदानवते। अरंकृते=अलङ्कृते= स्वाचरणैर्जनानामलंकर्त्रे। कर्मणां च पर्य्याप्तकर्त्रे वा जनाय। तेषां हि आदित्यानां सभासदाम्। चित्रं=नानाविधम्। उक्थ्यम्=प्रशंसनीयम्। वरूथम्=धनं पुरस्कारः पारितोषिकञ्च। अस्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Whatever be your defence, protection and relief for the worker, producer or creator of soma while he works to the point of weariness, exhaustion and retirement, for that plead for us and get us the relief needed, deserved and allowed.
