देवता: आदित्याः
ऋषि: मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
वि षु द्वेषो॒ व्यं॑ह॒तिमादि॑त्यासो॒ वि संहि॑तम् । विष्व॒ग्वि वृ॑हता॒ रप॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
vi ṣu dveṣo vy aṁhatim ādityāso vi saṁhitam | viṣvag vi vṛhatā rapaḥ ||
पद पाठ
वि । सु । द्वेषः॑ । वि । अं॒ह॒तिम् । आदि॑त्यासः । वि । सम्ऽहि॑तम् । विष्व॑क् । वि । वृ॒ह॒त॒ । रपः॑ ॥ ८.६७.२१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:67» मन्त्र:21
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:54» मन्त्र:6
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:21
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (आदित्याः) हे प्रकाशमान सभासदों ! (अदिते) हे सभे ! (सन्यसे) हमारे कल्याण और महोत्सव के लिये (तत्+नव्यम्) क्या आप लोगों की ओर से वह नूतन साहाय्य और रक्षण (नः) हमको (सु) सुविधा और आराम के साथ प्राप्त हो सकता है, (यत्+मुमोचति) जो हमको विविध क्लेशों से छुड़ाया करता है। यहाँ दृष्टान्त देते हैं, (बन्धात्+बद्धम्+इव) जैसे बन्धन से बद्ध पशु या पुरुष को खोलते हैं ॥१८॥
भावार्थभाषाः - हे सभ्यो ! प्रजाओं में नूतन-नूतन उपाय और साहाय्य पहुँचाने का प्रबन्ध करो ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'द्वेष- कुटिलता - छल-पाप' से दूर
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आदित्यासः) = आदित्य विद्वानो ! आप (द्वेषः) = द्वेष को (सु) = सम्यक् (विवृहता) = हमारे जीवन में से उन्मूलित कर दो। (अंहतिम्) = कुटिलतारूप पाप को (वि) = हमारे से पृथक् करो। (संहितम्) = धोखा-छल, कपट आदि की वृत्ति को (वि) = हमारे से पृथक् करिये। [२] आप अनुग्रह करके (विष्वक्) = विविध क्रियाओं में आ जानेवाले (रपः) = दोषों को विवृहत उन्मूलित करिये। हमारा जीवन आपके अनुग्रह से निर्दोष हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आदित्यों का सम्पर्क हमें 'द्वेष- कुटिलता-छल व दोषों' से दूर करे। इस निर्दोष जीवनवाले व्यक्ति को 'मेधा, बुद्धि व मेध यज्ञ' ही प्रिय होते हैं, सो यह प्रिय मेध कहलाता है। यह प्रार्थना करता है कि-
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे आदित्याः=सभासदः ! हे अदिते=सभे ! युष्माकम्। तत् नव्यं=नूतनं=साहाय्यं रक्षणम्। सन्यसे=संभजनाय। नः=अस्माकम्। सुभवतु। यद्रक्षणम् अस्मान्। क्लेशात्। मुमोचति=मुञ्चति। अत्र दृष्टान्तः=बन्धात्=बन्धनात्। बद्धं पुरुषमिव ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Adityas, brilliant rulers and leaders of the nation, totally destroy jealousy and enmity, eliminate distress and depression, sin and crime, wipe out organised crime, terror and combined attacks, and uproot all disease, infirmity and disability from the earth.
