देवता: आदित्याः
ऋषि: मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः
छन्द: गायत्री
स्वर: षड्जः
तत्सु नो॒ नव्यं॒ सन्य॑स॒ आदि॑त्या॒ यन्मुमो॑चति । ब॒न्धाद्ब॒द्धमि॑वादिते ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tat su no navyaṁ sanyasa ādityā yan mumocati | bandhād baddham ivādite ||
पद पाठ
तत् । सु । नः॒ । नव्य॑म् । सन्य॑से । आदि॑त्याः । यत् । मुमो॑चति । ब॒न्धात् । ब॒द्धम्ऽइ॑व । अ॒दि॒ते॒ ॥ ८.६७.१८
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:67» मन्त्र:18
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:54» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:18
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (आदित्याः) हे सभासदों माननीय पुरुषो ! आप लोगों की कृपा और राज्यप्रबन्ध से (इयम्+शरुः) यह हिंसा करनेवाला दुर्भिक्षादिरूप आपत्तिजाल (नः) हम लोगों को (अजघ्नुषी) न सताते हुए (अस्मद्) हम लोगों से (सु+अपो+एतु) कहीं दूर चला जाए और इसी प्रकार (दुर्मतिः) हमारी दुर्मति भी (अप) यहाँ से कहीं दूर भाग जाए ॥१५॥
भावार्थभाषाः - अज्ञानता और दरिद्रता ये दोनों महापाप हैं, इनको यथाशक्ति सदा क्षीण हीन बनाया करो ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[नव्य] स्तुत्य ज्ञान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आदित्याः) = ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान का आदान करनेवाले ज्ञानी पुरुषो ! (नः) = हमारे लिए (तत्) = वह (नव्यं) = स्तुत्य [नु स्तुतौ] अथवा हमें गतिशील बनानेवाला [नव गतौ] ज्ञान (सुसंन्यसे) = सम्यक् सेवनीय हो (यत्) = जो (मुमोचति) = सब अशुभ कर्मों से छुड़ानेवाला होता है। [२] हे (अदिते) = स्वास्थ्य की देवते ! मुझे वह ज्ञान प्राप्त हो जो (बद्धम् इव) = विषय-जाल से बद्ध-सा हुए हुए मुझको (बन्धात्) = बन्धन से (मुमोचति) = छुड़ा देता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम आदित्यों के सम्पर्क में स्वस्थ रहते हुए उस ज्ञान को प्राप्त करें जो हमें विषयों के बन्धन से मुक्त करनेवाला हो।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे आदित्याः=सभासदः ! युष्माकं कृपया। इयं शरुः=दुर्भिक्षादिरूपा हिंसिका प्रसितिः। नः=अस्मान्। अजघ्नुषी=अहिंसन्ती सती। अस्मद्=अस्मत्तः। सु=सुष्ठु। अपो+एतु=अपैतु=अपगच्छतु। एवम् दुर्मतिरपि अपगच्छतु ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Adityas, O mother Aditi, we hope and pray may that ever new strength and sustenance of yours, which you give us for our good and protection, which saves us like people fettered in bondage and released, be extended to us ever as before.
