देवता: आदित्याः
ऋषि: मत्स्यः साम्मदो मान्यो वा मैत्रावरुणिर्बहवो वा मत्स्या जालनध्दाः
छन्द: विराड्गायत्री
स्वर: षड्जः
उ॒त त्वाम॑दिते मह्य॒हं दे॒व्युप॑ ब्रुवे । सु॒मृ॒ळी॒काम॒भिष्ट॑ये ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uta tvām adite mahy ahaṁ devy upa bruve | sumṛḻīkām abhiṣṭaye ||
पद पाठ
उ॒त । त्वाम् । अ॒दि॒ते॒ । म॒हि॒ । अ॒हम् । दे॒वि॒ । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । सु॒ऽमृ॒ळी॒काम् । अ॒भिष्ट॑ये ॥ ८.६७.१०
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:67» मन्त्र:10
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:52» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:10
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (आदित्याः देवाः) हे देव सभासदों ! (अद्भुतैनसः) आप सब निरपराध और निष्पाप हैं। हे देवो ! (अंहोः) हिंसक अपराधी और पापी जनों का (उरु+अस्ति) महाबन्धन और (अनागसः) निरपराधी जनों के लिये (रत्नम्) रमणीय श्रेय होता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - सभासद् अपने सदाचार को वैसा बनावें कि वे कभी पाप और अपराध करते हुए न पाए जाएँ, क्योंकि हिंसक पापी जनों को महादण्ड और निरपराधी को श्रेय मिलता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अदिति [मही- देवी- सुमृडीका]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और हे (महि) = महनीय, (देवि) = प्रकाशमयी (अदिते) = स्वास्थ्य की देवते ! (अहं) = मैं (त्वाम् उपब्रुवे) = तेरी ही आराधना करता हूँ-तुझे ही माँगता हूँ। [२] (सुमृडीकाम्) = उत्तम सुख को देनेवाली तुझ स्वास्थ्य की देवता को ही (अभिष्टये) = इष्ट प्राप्ति के लिए पुकारता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वास्थ्य ही हमारे जीवनों को महान् प्रकाशमय व सुखी बनाता है। ['मही- देवी- सुमृडीका' अदिति]
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे देवाः ! हे आदित्याः ! यूयम्। अद्भुतैनसः= अभूतापराधाः स्थ। किन्तु। अंहोः=हिंसाकर्तुर्जनस्य। उरु=महत्पापमस्ति यद्वा महद् बन्धनमस्ति। तथा अनागसः=निरपराधस्य। रत्नम्=रमणीयं श्रेयोऽस्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - And O great, brilliant and sovereign assembly of the nation, generous and gracious power, conscientiously I speak to you, pray save us from harm and injury, help us achieve our heart’s desire and cherished objectives.
