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कदू॒ न्व१॒॑स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म् । केनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुष॒: परि॑ वृत्र॒हा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kad ū nv asyākṛtam indrasyāsti pauṁsyam | keno nu kaṁ śromatena na śuśruve januṣaḥ pari vṛtrahā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कत् । ऊँ॒ इति॑ । नु । अ॒स्य॒ । अकृ॑तम् । इन्द्र॑स्य । अ॒स्ति॒ । पौंस्य॑म् । केनो॒ इति॑ । नु । क॒म् । श्रोम॑तेन । न । शि॒श्रु॒वे॒ । ज॒नुषः॑ । परि॑ । वृ॒त्र॒ऽहा ॥ ८.६६.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:66» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:49» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुहूत) हे बहुपूजित (वज्रिवः) हे दण्डधर (द्युक्ष) हे दिव्यलोकस्थ (सोमपाः) हे संसाररक्षक देव ! तू (मदाय) आनन्द के लिये (सोमेषु) जगतों में (सचा) सब पदार्थों के साथ निवास कर। हे इन्द्र ! (त्वम्+इत्+हि) तू ही (ब्रह्मकृते) स्तोत्ररचयिता को और (सुन्वते) शुभकर्मियों को (काम्यम्+वसु) कमनीय (वसु) धन (देष्ठः+भुवः) देनेवाला हो ॥६॥
भावार्थभाषाः - सोम=संसार। पुरु=बहुत। देष्ठ+दातृतमम्। ब्रह्मकृत्। ब्रह्म=स्तोत्र ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सर्वाणि बलकर्माणि इन्द्रस्य '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कत् उ नु) = कौन-सा निश्चय से (पौंस्यं) = पौरुष का काम - वृत्र आदि का विनाश रूप कर्म, (अस्य) = इस (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यशाली प्रभु का अकृतम् अस्ति न किया हुआ है ? अर्थात् वृत्रवध आदि सब पौरुष के कर्म इस प्रभु द्वारा ही तो किये जाते हैं। [२] (केन उ नु श्रोमतेन) = और निश्चय से किस श्रावणीय पौरुष के कार्य से (न शुश्रुवे) = वे प्रभु सुने नहीं जाते। (जनुषः परि) = जन्म से लेकर ही, अर्थात् अब ही उस प्रभु का हृदयों में कुछ प्रादुर्भाव होता है, तभी ही वे प्रभु (वृत्रहा) = वासना का विनाश करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वासनाविनाश आदि सब शक्तिशाली कर्मों को करनेवाले प्रभु ही हैं। वे प्रभु हमारे हृदयों में प्रादुर्भूत होते ही सब शत्रुओं का विनाश कर देते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे पुरुहूत=पुरुभिर्बहुभिर्हूत ! आहूत=पूजित ! हे वज्रिवः=वज्रिवन् दण्डधर ! हे द्युक्ष=दिविक्षय ! द्युनिवासिन् ! हे सोमपाः=संसाररक्षक ! “सोमं संसारं पाति रक्षतीति” हे भगवन् ! सोमेषु=जगत्सु। मदाय=आनन्दाय। सचा सह भव। हे इन्द्र ! त्वमिद् हि=त्वमेव। ब्रह्मकृते=मन्त्रकृते। सुन्वते=यजते। काम्यं=कमनीयम्। वसु। देष्ठः=दातृतमः। भुवः=भवसि ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - What wonder work is that which is not the achievement of Indra’s valour? By which person hasn’t his glory been perceived through his wonder deeds? He is the destroyer of evil and darkness by his very nature.