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इन्द्र॑ गृणी॒ष उ॑ स्तु॒षे म॒हाँ उ॒ग्र ई॑शान॒कृत् । एहि॑ नः सु॒तं पिब॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indra gṛṇīṣa u stuṣe mahām̐ ugra īśānakṛt | ehi naḥ sutam piba ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र॑ । गृ॒णी॒षे । ऊँ॒ इति॑ । स्तु॒षे । म॒हान् । उ॒ग्रः । ई॒शा॒न॒ऽकृत् । आ । इ॒हि॒ । नः॒ । सु॒तम् । पिब॑ ॥ ८.६५.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:65» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:46» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

उसी की व्यापकता दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! (यद्वा) अथवा (स्वर्णरे) प्रकाशमय (दिवः+प्रस्रवणे) सूर्य्य के गमनस्थान में (यद्वा) यद्वा (समुद्रे) अन्तरिक्ष में यद्वा (अन्धसः) अन्नोत्पत्तिकरण पृथिवी के गमनस्थान में अथवा जहाँ-तहाँ सर्वत्र स्थित होकर तू (मादयसे) प्राणिमात्र को आनन्दित कर रहा है, तथापि हम उपासक तेरे शुभागमन के लिये तुझसे प्रार्थना करते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महिमा-बल-ऐश्वर्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सब बल के कर्मों को करनेवाले प्रभो ! (गृणीषे) = आप ही इस रूप में कहे जाते हो कि (महान्) = आप पूजनीय व सर्वव्यापक हैं, (उग्र:) = उद्गूर्ण बलवाले हैं-बढ़े हुए बलवालें हैं, (ईशानकृत्) = सब ऐश्वर्यों के करनेवाले हैं। [२] हे इन्द्र ! मैं (उ) = निश्चय से (स्तुषे) = आपका स्तवन करता हूँ। आप (नः एहि) = हमें प्राप्त होइए और (सुतं पिब) = हमारे अन्दर उत्पन्न हुए हुए सोम का पान करिये। इस सोमरक्षण द्वारा ही हम 'महिमा - बल व ऐश्वर्य' को प्राप्त करनेवाले होंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उस 'महान्, उग्र, ईशानकृत्' प्रभु का स्मरण करते हुए हम सोम का रक्षण करें और 'महिमा, बल व ऐश्वर्य' को प्राप्त करने का प्रयत्न करें। मन में महिमा, शरीर में बल व मस्तिष्क में ज्ञानैश्वर्य का हम धारण करें।
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शिव शंकर शर्मा

तस्य व्यापकतां दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! यद्वा=अथवा त्वम्। स्वर्णरे=स्वः प्रकाशस्य नेतरि=प्रकाशमये। दिवः=सूर्य्यस्य। प्रस्रवणे= गमनस्थाने। यद्वा। समुद्रे=अन्तरिक्षे। यद्वा। अन्धसः=अन्नस्य=अन्नकारणभूतायाः पृथिव्याः प्रस्रवणे। त्वं स्थित्वा मादयसे। सर्वान् प्राणिन आनन्दयसि। तथापि वयमुपासकास्त्वामागमनाय प्रार्थयामहे ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, great, blazing brave, ruler and glorifier of rulers, I adore and exalt you. Pray come, drink the soma of our achievement and protect and promote the world of your creation.