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यद्वा॑ प्र॒स्रव॑णे दि॒वो मा॒दया॑से॒ स्व॑र्णरे । यद्वा॑ समु॒द्रे अन्ध॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad vā prasravaṇe divo mādayāse svarṇare | yad vā samudre andhasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । वा॒ । प्र॒ऽस्रव॑णे । दि॒वः । मा॒दया॑से । स्वः॑ऽनरे । यत् । वा॒ । स॒मु॒द्रे । अन्ध॑सः ॥ ८.६५.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:65» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:46» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! (शर्य्यणावति) इस विनश्वर शरीर में (सुसोमायाम्) इस रसमयी बुद्धि में और (आर्जीकीये) समस्त इन्द्रियों के सहयोग में (अधिश्रितः) आश्रित (ते) तेरे अनुग्रह से (मदिन्तमः) तेरा आनन्दजनक याग सदा हो रहा है। इसको ग्रहण कीजिये ॥११॥
भावार्थभाषाः - याग दो प्रकार के हैं। जो विविध द्रव्यों से किया जाता है, वह बाह्य और जो इस शरीर में बुद्धि द्वारा अनुष्ठित होता है, वह आभ्यन्तर याग है। इसी को मानसिक, आध्यात्मिक आदि भी कहते हैं और यही यज्ञ श्रेष्ठ भी है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानस्त्रोत, धर्म्ययुद्ध, अन्नभण्डार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र के अनुसार हे प्रभो ! आप आराधकों को प्राप्त होते हो, और (यद् वा) = या तो (दिवः प्रस्त्रवणे) = ज्ञान के स्रोत में (मादयासे) = उन्हें आनन्दित करते हो अथवा स्वर्णरे स्वर्ग को प्राप्त करानेवाले धर्म्ययुद्ध में उन्हें आनन्द प्राप्त कराते हैं । (यद्वा) = अथवा (अन्धसः समुद्रे) = अन्न के समुद्र में अन्न के भण्डारों में उन्हें आनन्द देनेवाले होते हों। [२] प्रभु का आराधक ब्राह्मणवृत्ति का होने पर ज्ञान के स्रोत में तैरता-सा प्रतीत होता है। क्षत्रियवृत्ति का होकर यह आराधक धर्म्ययुद्धों में प्राणत्याग करता हुआ स्वर्ग को प्राप्त करता है। वैश्यवृत्ति का होने पर यह राष्ट्र के लिए अन्नसमुद्रों को जन्म देनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक 'ज्ञान, बल व धन' का भण्डार बनता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! शर्य्यणावति=विशरणवति=विनश्वरे शरीरे। सुसोमायां=बुद्धौ। आर्जीकीये=इन्द्रियाणां मध्ये। अधिश्रितः=आश्रितः। ते=तव। मदिन्तमः=प्रियतमः। यज्ञः सर्वदा भवति तं जुषस्वेत्यर्थः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whether in the heavenly radiations and cascades of light or in the middle regions of the sky or on the earthly regions of food and soma, wherever you rejoice and rain down showers of joy: