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क्व१॒॑ स्य वृ॑ष॒भो युवा॑ तुवि॒ग्रीवो॒ अना॑नतः । ब्र॒ह्मा कस्तं स॑पर्यति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kva sya vṛṣabho yuvā tuvigrīvo anānataḥ | brahmā kas taṁ saparyati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क्व॑ । स्यः । वृ॒ष॒भः । युवा॑ । तु॒वि॒ऽग्रीवः॑ । अना॑नतः । ब्र॒ह्मा । कः । तम् । स॒प॒र्य॒ति॒ ॥ ८.६४.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:64» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:45» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:7


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! यद्यपि तेरा (क्षयः) निवासस्थान (दिवि) पवित्र शुद्ध कपटादिरहित और परमोत्कृष्ट प्रदेश में है, तू अशुद्धि अपवित्रता के निकट नहीं जाता, तथापि हम सब (चर्षणीनाम्) तेरे ही अधीन प्रजाएँ हैं, तेरे ही पुत्र हैं, अतः हम लोगों के मध्य (आघोषन्) स्वकीय आज्ञाओं को सुनाता हुआ (एहि) आ और (प्रेहि) जा। हे भगवन् ! तू (उभे) दोनों (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (आपृणासि) प्रसन्न पूर्ण और सुखी रखता है, अतः तेरे अनुग्रहपात्र हम जन भी हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर परमपवित्र है, वह अशुद्धि को नहीं चाहता, अतः यदि उसकी सेवा में रहना चाहते हो, तो वैसे ही बनो ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विरलो जनः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] संसार में (स्यः) = वह व्यक्ति (क्व) = कहाँ है ? जो (वृषभः) = शरीर में शक्ति के सेचन के द्वारा बलवान् बना है। (युवा) = बुराइयों को अपने से पृथक् करनेवाला व अच्छाइयों का अपने से मिश्रण करनेवाला है। (तुविग्रीवः) = महान् ग्रीवावाला है। (तुवि) = अनेक ग्रीवाओंवाला है। अन्नमय कोश में बलवान्, प्राण [इन्द्रियाँ] मय कोश में असत् को छोड़कर सत्वाला तथा मनोमय कोश में तुविग्रीव । यह सभी को अपनी मैं में समाविष्ट करता है-सो सभी के साथ मिलकर खाता है। यही 'अनेक ग्रीवाओंवाला होना' हैं । [२] यह (अनानतः) = ज्ञान के सम्पादन के कारण विषयवासना से न दबा हुआ होता है। (ब्रह्मा) = यह परमार्थ ज्ञान को प्राप्त करता है कि 'सब प्राणी उस प्रभु में हैं, सबमें उस प्रभु का वास है'। यह ज्ञान ही इसकी आनन्दमयता का कारण बनता है। (कः) = वह आनन्दमय प्रभु भी (तं) = उस 'वृषभ-युवा- तुविग्रीव - अनानत - ब्रह्म' बनने का प्रयत्न करते हुए प्रभु के प्रिय बनें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! यद्यपि। तव क्षयः=निवासस्थानम्। दिवि=परमोत्कृष्टे प्रदेशे वर्तते। तथापि। अस्माकं चर्षणीनां=प्रजानाम्। मध्ये। आघोषन्=स्वकीयमाज्ञां श्रावयन्। एहि=आगच्छ। प्रेहि च। हे भगवन् ! यतस्त्वम्। उभे रोदसी द्यावापृथिव्यौ। आपृणासि=प्रीणयसि ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Where does the generous lord of showers, ever youthful and eternal, of broad shoulders unbent, reside? Which sage and scholar can ever comprehend and serve him in full knowledge and competence?