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त्यं चि॒त्पर्व॑तं गि॒रिं श॒तव॑न्तं सह॒स्रिण॑म् । वि स्तो॒तृभ्यो॑ रुरोजिथ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tyaṁ cit parvataṁ giriṁ śatavantaṁ sahasriṇam | vi stotṛbhyo rurojitha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्यम् । चि॒त् । पर्व॑तम् । गि॒रिम् । श॒तऽव॑न्तम् । स॒ह॒स्रिण॑म् । वि । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । रु॒रो॒जि॒थ॒ ॥ ८.६४.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:64» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:44» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! (अराधसः) धनसम्पन्न होने पर जो शुभकर्म के लिये धन खर्च नहीं करते, उन (पणीन्) लुब्ध पुरुषों को (पदानि) चरणाघात से (नि+बाधस्व) दूर कर दे। (महान्+असि) तू महान् है, (हि) क्योंकि (कः+चन) कोई भी मनुष्य (त्वा+प्रति) तुझसे बढ़कर (न) समर्थ नहीं है ॥२॥
भावार्थभाषाः - पणि=प्रायः वाणिज्य करनेवाले के लिये आता है। यह भी देखा गया है कि प्रायः वाणिज्यकर्त्ता धनिक होते हैं। किन्तु जो धन पाकर व्यय नहीं करते, ऐसे लोभी पुरुष को वेदों में पणि कहते हैं। धनसंचय करके क्या करना चाहिये, यह विषय यद्यपि सुबोध है, तथापि सम्प्रति यह जटिल सा हो गया है। देशहित कार्य्य में धनव्यय करना, यह निर्वाद है, किन्तु देशहित भी क्या है, इसका जानना कठिन है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अविद्यापर्वत का विदारण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] अविद्या पञ्चपर्वा कहलाती है-' अविद्या अस्मिता राग द्वेष व अभिनिवेश' रूप पांच क्लेश ही इसके पांच पर्व हैं। यह अविद्या शत सहस्रों व हज़ारों रूपों में प्रकट होती है। प्रभु ही इस अविद्यापर्वत का विदारण करते हैं । (त्यं) = उस (चित्) = निश्चय से पर्वत पाँच पर्वोंवाले अविद्यापर्वत को, गिरिं जो हमें निगल-सा जाता है, (शतवन्तं) = सैकड़ों शाखाओंवाला है तथा (सहस्रिणं) = सहस्रों प्रशाखाओंवाला हैं, इस पर्वत को, हे प्रभो ! (स्तोतृभ्यः) = स्तोताओं के लिए आप ही (विरुरोजिथ) = विशेषरूप से भग्न करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु ही हमारे लिए अविद्या पर्वत का विनाश करेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! अराधसः=धनसम्पन्नानपि शुभकर्मणो धनादातॄन्। पणीन्=लुब्धान् पुरुषान्। पदानि=निबाधस्व। यतस्त्वं महानसि। हि=यतः। न=न खलु। त्वा=त्वां प्रति कश्चन समर्थोऽस्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You break and break open the cloud and the mountain bearing a hundred and a thousand gifts for the divine singers, celebrants and dedicated yajakas.