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अ॒यं ते॑ शर्य॒णाव॑ति सु॒षोमा॑या॒मधि॑ प्रि॒यः । आ॒र्जी॒कीये॑ म॒दिन्त॑मः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ te śaryaṇāvati suṣomāyām adhi priyaḥ | ārjīkīye madintamaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । ते॒ । श॒र्य॒णाऽव॑ति । सु॒ऽसोमा॑याम् । अधि॑ । प्रि॒यः । आ॒र्जी॒कीये॑ । म॒दिन्ऽत॑मः ॥ ८.६४.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:64» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:45» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:11


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शिव शंकर शर्मा

किसी के यज्ञ में इन्द्र जाता है या नहीं, यह वितर्कणा करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (स्वित्) मैं उपासक वितर्क कर रहा हूँ कि (कस्य+सवनम्) किस पुरुष के याग में वह इन्द्र (अव+गच्छति) जाता है, जो (वृषा) वृषा अर्थात् अभीष्ट वस्तुओं की वर्षा करनेवाला, इस नाम से प्रसिद्ध है और (जुजुष्वान्) जो शुभकर्मियों के ऊपर प्रसन्न होनेवाला है। (कः+उ+स्वित्) कौन ज्ञानी विज्ञानी (इन्द्रम्) उस इन्द्र को (आचके) अच्छे प्रकार जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - ईदृग् ऋचाओं से उस परमदेव की अवगम्यता और दुर्बोधता दिखलाई जाती है। उस महती शक्ति को विरले ही विद्वान् जानते हैं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शर्यणावान्- सुषोमा- आर्जीकीय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (अयं) = यह (ते) = आपसे उत्पादित सोम (शर्यणावति) = [शृ हिंसायाम्] वासनाओं का संहार करनेवाले पुरुष में तथा (सुषोमायां) = अत्यन्त सौम्य स्वभाव की प्रजाओं में (अधि प्रियः) = आधिक्येन प्रीतिवाला होता है। [२] (आर्जीकीये) = सरलता से अलंकृत पुरुष में यह सोम (मदिन्तम:) = अतिशयेन हर्षजनक होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिए तीन बातें आवाश्यक हैं- [१] वासनाओं का संहार [२] सौम्यता [३] सरलता । सुरक्षित सोम प्रीति व आनन्द का जनक होता है।
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शिव शंकर शर्मा

कस्यचिदपि सवनमिन्द्रो याति नवेति वितर्कते।

पदार्थान्वयभाषाः - स्विदिति वितर्के। वृषा=वर्षिता कामानाम्। जुजुष्वान्=प्रीयमाणः। इन्द्रः। कस्य सवनं=यागम्। प्रति=अवगच्छति क उ स्विदाचके ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In this mortal body, in this vibrant intellect, in these fresh and harmonious senses and mind, this lovely and most exhilarating yajna is being performed.