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अ॒स्य वृष्णो॒ व्योद॑न उ॒रु क्र॑मिष्ट जी॒वसे॑ । यवं॒ न प॒श्व आ द॑दे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asya vṛṣṇo vyodana uru kramiṣṭa jīvase | yavaṁ na paśva ā dade ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य । वृष्णः॑ । वि॒ऽओद॑ने । उ॒रु । क्र॒मि॒ष्ट॒ । जी॒वसे॑ । यव॑म् । न । प॒श्वः । आ । द॒दे॒ ॥ ८.६३.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:63» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:43» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

उसी का महत्त्व दिखलाया जाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रे) इसी परमात्मा में (विश्वानि+वीर्य्या) सर्व सामर्थ्य विद्यमान हैं, जो सामर्थ्य (कृतानि) पूर्व समय में दिखलाए गए और हो चुके हैं और (कर्त्वानि+च) कर्त्तव्य हैं, (अर्काः) अर्चनीय और माननीय आचार्य्यादिक (यम्) जिसको (अध्वरम्+विदुः) अहिंसक कृपालु और पूज्यतम समझते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि आदि की रचना पूर्वकाल में हो चुकी है और कितने लोक-लोकान्तर अब भी बन रहे हैं और कितने अभी होनेवाले हैं, ये सब ही उसी का महत्त्व है, अतः उसी को गाओ ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सात्विक भोजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य) = इस (वृष्ण:) = सब सुखों के वर्षक प्रभु के प्रभु से उत्पन्न किये गये (व्योदने) = विशिष्ट (ओदन) = सात्त्विक भोजन के होने पर यह जीव (उरु क्रमिष्ट) = खूब क्रियाशील होता है तथा (जीवसे) = उत्कृष्ट जीवन के लिए होता है। [२] (न) = जिस प्रकार (पश्वः) = पशु (यवं) = जौ को, उसी प्रकार यह भोजन को (आददे) = ग्रहण करता है । पशु स्वाद के कारण नहीं खाते रहते। इसी प्रकार यह भी मात्रा में ही भोजन करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस सुखों के वर्षक प्रभु से दिये गये सात्त्विक भोजनों को ही करें।
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शिव शंकर शर्मा

तस्यैव महत्त्वं प्रदर्श्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - अस्मिन्नेव इन्द्रे=परमात्मनि। विश्वानि=सर्वाणि। वीर्य्या=वीर्य्याणि=शक्तयः। विद्यन्ते। यानि वीर्य्याणि प्रागेव कृतानि=साधितानि। यानि चाग्रे कर्त्वानि=कर्त्तव्यानि वर्तन्ते। अर्काः=अर्चनीयाः। आचार्य्यादयः। यमध्वरम्=अहिंसकं पूज्यतमञ्च। विदुः=जानन्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - On receiving the variety and versatility of food, energy and inspiration from this generous and virile Indra, life rises and springs forward for the joy of living as an animal gets the grass for food and energy and plays around.