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यत्पाञ्च॑जन्यया वि॒शेन्द्रे॒ घोषा॒ असृ॑क्षत । अस्तृ॑णाद्ब॒र्हणा॑ वि॒पो॒३॒॑ऽर्यो मान॑स्य॒ स क्षय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat pāñcajanyayā viśendre ghoṣā asṛkṣata | astṛṇād barhaṇā vipo ryo mānasya sa kṣayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । पाञ्च॑ऽजन्यया । वि॒शा । इन्द्रे॑ । घोषाः॑ । असृ॑क्षत । अस्तृ॑णात् । ब॒र्हणा॑ । वि॒पः । अ॒र्यः । मान॑स्य । सः । क्षयः॑ ॥ ८.६३.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:63» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:43» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:7


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शिव शंकर शर्मा

इन्द्र के गुणों को दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः+इन्द्रः) वह इन्द्रवाच्य ईश्वर (प्रत्नथा) पूर्ववत् अब भी (कविवृधः) कवियों का वर्धयिता (वाकस्य+वक्षणिः) स्तुतिरूप वाणी का श्रोता और (अर्कस्य) अर्चनीय आचार्य्यादिकों को (शिवः) सुख पहुँचानेवाला है। वह ईश (अस्मत्रा+होमनि) हम लोगों के होमकर्म में (अवसे+गन्तु) रक्षा के लिये जाए ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिस कारण सत्पुरुषों को वह सदा कल्याण पहुँचाता है, अतः यदि हम भी सन्मार्ग पर चलेंगे, तो वह हमारे लिये भी सुखकारी होगा, इसमें सन्देह नहीं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पञ्चजन्य का प्रभुपूजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब पाञ्चजन्यया 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र व निषाद' रूप पंचजनों का हित करनेवाले (विशा) = प्रजा से (इन्द्रे) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के विषय में घोषाः स्तुतिवचन (असृक्षत) = किये जाते हैं तो वे प्रभु (बर्हणा) = [बृहि वृद्धौ] अपनी शत्रुओं के उद्धर्हण की शक्ति से अस्तृणात् काम आदि शत्रुओं का हिंसन करते हैं। [२] इसीलिए (विपः) = मेधावी स्तोता के (सः अर्य:) = वे स्वामी प्रभु (मानस्य) = पूजा के (क्षय:) = निवासस्थान होते हैं। मेधावी स्तोता प्रभु का पूजन करता हुआ काम आदि शत्रुओं का विनाश कर पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु का स्तोता वही है जो पञ्जजनों का हित करे। प्रभु स्तोता के शत्रुओं का विनाश करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

इन्द्रगुणान् दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - स इन्द्रः। प्रत्नथा=पुरातनकालवदिदानीमपि। कविवृधः=कवीनां वर्धयिता। वाकस्य=स्तुतिरूपस्य वचनस्य। वक्षणिः=वोढा श्रोता। अर्कस्य=अर्चनीयस्य पूज्यस्याचार्य्यादेः। शिवः=मङ्गलकारी। ईदृगीशः। अस्मत्रा=अस्मासु मध्ये। होमनि=यागे। अवसे= रक्षणाय। गन्तु=गच्छतु ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the universal community of five classes of people join together and raise their voices of prayer to Indra, then with his might he wards off their enemies and misfortunes. That same lord of the people, omniscient and master is the centre of my worship too.