तद्दधा॑ना अव॒स्यवो॑ यु॒ष्माभि॒र्दक्ष॑पितरः । स्याम॑ म॒रुत्व॑तो वृ॒धे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tad dadhānā avasyavo yuṣmābhir dakṣapitaraḥ | syāma marutvato vṛdhe ||
पद पाठ
तत् । दधा॑नाः । अ॒व॒स्यवः॑ । यु॒ष्माभिः॑ । दक्ष॑ऽपितरः । स्याम॑ । म॒रुत्व॑तः । वृ॒धे ॥ ८.६३.१०
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:63» मन्त्र:10
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:43» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:10
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शिव शंकर शर्मा
उसके अनुग्रह को दिखलाते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - (यद्) जब-२ (पाञ्चजन्यया+विशा) समस्त मनुष्य जातियाँ अपने-अपने देश के पवित्र स्थानों में सम्मिलित हों (इन्द्रे) परमात्मा के निकट (घोषाः+असृक्षत) निज प्रार्थनाओं को सुनाती हैं, तब-तब वह देव (बर्हणा) स्वकीय महत्त्व से (अस्तृणात्) उनके विघ्नों को दूर कर देता है, क्योंकि वह (विपः) विशेषरूप से पालक है, (अर्य्यः) माननीय है और (मानस्य) पूजा का (क्षयः) निवासस्थान है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दक्षपितरः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम (युष्माभिः) = आपसे - प्रभु से दिये गये (तद्) = उस, गतमन्त्र में वृणत व्योदन को- सात्त्विक भोजन को, (दधानाः) = धारण करते हुए (अवस्यवः) = रक्षण की कामनावाले व (दक्षपितरः) = शक्ति के रक्षक हों। [२] हम (मरुत्वतः) = प्राणोंवाले इस इन्द्र के (वृधे) = वर्धन के लिए (स्याम) = हों । सात्त्विक अन्न का सेवन हमारी प्राणशक्ति को बढ़ाए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- हम सात्त्विक अन्नों के द्वारा अपना रक्षण करें, शक्ति को बढ़ाएँ तथा प्राणशक्तिसम्पन्न बनें।
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शिव शंकर शर्मा
तस्यानुग्रहं दर्शयति।
पदार्थान्वयभाषाः - यद्=यदा-यदा। पाञ्चजन्यया=पञ्चजनेषु भवा पाञ्चजन्या। तया “निषदपञ्चमाश्चत्वारो वर्णाः पञ्चजनाः”। विशा=प्रजया। इन्द्रे=परमात्मनि। घोषाः=स्वस्ववाण्यः। असृक्षत=सृज्यन्ते=क्रियन्ते। तदा तदा स हीश्वरः। बर्हणा=स्वमहत्त्वेनैव। प्रजायाः। विघ्नान्। अस्तृणान्= दूरीकरोति। यतः। स विपः=विशेषेण पाता। अर्य्यः=पूज्यः। मानस्य=पूजायाश्च। क्षयः= निवासोऽस्तीति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Bearing that energy in body and that divine source of energy in mind, let us all, seekers of protection and promotion, be masters of strength and expertise and try to be commanders of that energy and ambition to achieve higher progress in corporate life.
