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स पू॒र्व्यो म॒हानां॑ वे॒नः क्रतु॑भिरानजे । यस्य॒ द्वारा॒ मनु॑ष्पि॒ता दे॒वेषु॒ धिय॑ आन॒जे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa pūrvyo mahānāṁ venaḥ kratubhir ānaje | yasya dvārā manuṣ pitā deveṣu dhiya ānaje ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । पू॒र्व्यः । म॒हाना॑म् । वे॒नः । क्रतु॑ऽभिः । आ॒न॒जे॒ । यस्य॑ । द्वारा॑ । मनुः॑ । पि॒ता । दे॒वेषु॑ । धियः॑ । आ॒न॒जे ॥ ८.६३.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:63» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:42» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:1


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! (भूरिगो) बहुसंसार (मघवन्) हे परमधनिन् भगवन् ! जो विद्वान् (ते+शर्मणि) तेरी आज्ञा और कृपा के आश्रय में विद्यमान हैं, वे (भूरि) बहुत-२ तेरे यश को गाते हैं और जो (ते+शवः) तेरा बल (जातम्) इन प्रकृतियों में फैला हुआ है, उसको (उद्+ववृधुः) अपने गान से बढ़ा रहे हैं, (त्वाम्) तुझको साक्षात् (उद्) उच्च स्वर से गाते हैं, (तव+क्रतुम्) तेरे विज्ञानों और कर्मों को (उद्) उच्च स्वर से गाते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - भूरिगो। गौ यह नाम पृथिवी का है, यह प्रसिद्ध है। यहाँ उपलक्षण है अर्थात् सम्पूर्ण संसार से अभिप्राय है। यद्वा संसार और गो शब्द का धात्वर्थ एक ही प्रतीत होता है “संसरतीति संसारः गच्छतीति गौः”। इस कारण ये दोनों शब्द ऐसे स्थलों में पर्य्यायवाची हैं ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कर्मों द्वारा प्रभु की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (महानां) = पूज्यों में (पूर्व्य:) = मुख्य (वेनः) = कान्त प्रभु (क्रतुभिः) = यज्ञात्मककर्मों के द्वारा आनजे प्राप्त होता है। अपने कर्तव्य कर्मों को करने से ही हम प्रभु का पूजन कर पाते हैं। [२] (यस्य) = जिस प्रभु के द्वारा प्राप्ति के साधनभूत [द्वारभूत] (धियः) = कर्मों को (मनुः पिता) = विचारशील रक्षक पुरुष (देवेषु) = देववृत्ति के पुरुषों में (आनजे) = प्राप्त होता है। उन देवों के पथ पर चलता हुआ यह विचारशील पुरुष भी प्रभु को प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की प्राप्ति यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहने से होती है। एक विचारशील पुरुष देवों का अनुसरण करता हुआ प्रभु को प्राप्त करता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! हे भूरिगो=बहुसंसार ! गावः संसारा गच्छन्तीति गावः। भूरयो भूयांस उत्पाद्यत्वेन संसारा विद्यन्ते यस्य। हे मघवन्=अतएव परमधनिन् ! हे महेश ! ये कंचन तव+शर्मणि=तवाज्ञाया तवानुग्रहे वर्तन्ते। ते विद्वांसः तव जातमुद्भूतं प्रकृतिषु शवो बलम्। उद्ववृधुः=उद्वर्धयन्ति। त्वाञ्च साक्षादेव वा उद्गायन्ति। तव क्रतुं प्रज्ञाञ्च उद्गायन्ति। एवं भूरि तव यशो गायन्तीत्यर्थः। भद्रा इत्यादि पूर्ववत् ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He, eternal spirit of the universe, love and desire and indeed the ideal of the great among humanity, is realised through holy acts of prayer and yajna, by the doors of whose grace the thinking man, fatherly man sustainer of life, attains noble knowledge and competence for action among the divinities of nature and humanity.