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धृ॒ष॒तश्चि॑द्धृ॒षन्मन॑: कृ॒णोषी॑न्द्र॒ यत्त्वम् । ती॒व्रैः सोमै॑: सपर्य॒तो नमो॑भिः प्रति॒भूष॑तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dhṛṣataś cid dhṛṣan manaḥ kṛṇoṣīndra yat tvam | tīvraiḥ somaiḥ saparyato namobhiḥ pratibhūṣato bhadrā indrasya rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

धृ॒ष॒तः । चि॒त् । धृ॒षत् । मनः॑ । कृ॒णोषि॑ । इ॒न्द्र॒ । यत् । त्वम् । ती॒व्रैः । सोमैः॑ । स॒प॒र्य॒तः । नमः॑ऽभिः । प्र॒ति॒ऽभूष॑तः । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ ॥ ८.६२.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:62» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:40» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

इन्द्र का महत्त्व दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अयुजः) वह इन्द्र अपने कार्य्य में किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं करता है। (असमः) उसके सदृश कोई नहीं है। (नृभिः+एकः) वह मनुष्यों और देवों में एक ही है। पुनः (अयास्यः) उसका क्षय कोई नहीं कर सकता। पुनः (पूर्वीः+कृष्टीः) पहले की और आज की सर्व प्रजाओं को (अति) उल्लङ्घन कर (प्र+वावृधे) अत्यन्त विस्तृत है अर्थात् (ओजसा) निज पराक्रम और प्रताप से (विश्वा+जातानि) सम्पूर्ण जगत् से वह बढ़ करके है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीव्रैः सोमैः सपर्यतः, नमोभिः प्रतिभूषतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (त्वं) = आप (तीव्र:) = शक्तिशाली (सोमैः) = शरीरस्थ सोम [वीर्य] कणों द्वारा (सपर्यतः) = आपका पूजन करते हुए उपासक के (मनः) = मन को (यत्) = जब (धृषतः चित् धृषत्) = धर्षक से भी धर्षक- शत्रुओं को पीस डालनेवाला (कृणोषि) = करते हैं। तब (नमोभिः) = आपके प्रति नमन से (प्रतिभूषतः) = अंग-प्रत्यंग को शक्ति से अलंकृत करते हुए पुरुष के लिए (इन्द्रस्य) = ऐश्वर्यशाली आपकी (रातयः) = देन (भद्राः) = कल्याणकर होती हैं। [२] प्रभु का पूजन वही करता है जो शरीर में सोम का रक्षण करता है और प्रभु के प्रति नमनवाला होता हुआ अंग-प्रत्यंग को शक्ति से अलंकृत करता है। प्रभु इस पुजारी के मन को शत्रुओं को पीस डालनेवाला बना देते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की उपासना सोमरक्षण व नमन द्वारा होती हैं। प्रभु हमारे मन को शत्रुओं का ध्वंसक बनाते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

इन्द्रस्य महत्त्वं प्रदर्श्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - कीदृशः स इन्द्र इत्यपेक्षायामाह, अयुज इत्यादि। अयुजः=योगरहितः असहायः, स्वकार्ये न केनचिद्योगं भजत इत्यर्थः। पुनः। असमः=असदृशः। पुनः। नृभिः=नृणां देवानाञ्च मध्ये एकः सर्वश्रेष्ठः। अयास्यः=उपक्षययितुमशक्यः। पुनः। पूर्वीः=पूर्वतनीः। कृष्टीः=प्रजाः। अतिक्रम्य स प्रवावृधे प्रकर्षेण वर्धते। ननु स ओजसा=स्वप्रतापेन पराक्रमेण च। सर्वाणि जातानि अतिक्रम्य प्रवर्धते भद्रा इत्यादि व्याख्यातम् ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As you raise the man of courage at heart to a bolder and more courageous hero, men with homage and potent soma oblations serve and glorify you. Great and glorious are the charities of Indra.