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अहि॑तेन चि॒दर्व॑ता जी॒रदा॑नुः सिषासति । प्र॒वाच्य॑मिन्द्र॒ तत्तव॑ वी॒र्या॑णि करिष्य॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahitena cid arvatā jīradānuḥ siṣāsati | pravācyam indra tat tava vīryāṇi kariṣyato bhadrā indrasya rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अहि॑तेन । चि॒त् । अर्व॑ता । जी॒रऽदा॑नुः । सि॒षा॒स॒ति॒ । प्र॒ऽवाच्य॑म् । इ॒न्द्र॒ । तत् । तव॑ । वी॒र्या॑णि । क॒रि॒ष्य॒तः । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ ॥ ८.६२.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:62» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:40» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

इस ऋचा से उसका न्याय दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! यह परमात्मा (प्रभङ्गी) दुष्टों को मर्दन करनेवाला (शूरः) अति पराक्रमी महावीर (मघवा) सर्वधनसम्पन्न (तुवीमघः) महाधनी (संमिश्लः) कर्मानुसार सुख और दुःखों से मिलानेवाला और (वीर्य्याय+कम्) पराक्रम के लिये सर्वथा समर्थ है। उसी को पूजो। (शतक्रतो) हे अनन्तकर्मन् महेश ! (ते) तेरे (उभा+बाहू) दोनों बाहू (वृषणा) सुकर्मियों को सुख पहुँचानेवाले और (या) जो बाहू पापियों के लिये (वज्रम्) न्यायदण्ड (नि+मिमिक्षतुः) धारण करते हैं, वैसे तुझको ही हम पूजते हैं ॥१८॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर के बाहू आदि का वर्णन आरोप से होता है। वह परम न्यायी और सर्वद्रष्टा है, अतः हे मनुष्यों ! पापों से डरो, नहीं तो उसका न्याय तुमको दण्ड देगा ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'जीरदानु' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह प्रभु (अहितेन) = न जोते हुए (अर्वता चित्) = घोड़े से ही (सिषासति) = सबके संभजन की कामनावाला होता है। 'घोड़े को जोतकर रथ से प्रभु आते हों' सो बात नहीं। प्रभु तो सदा सर्वत्र प्राप्त हैं ही। (जीरदानुः) = वे प्रभु ही जीवन को देनेवाले हैं। [२] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (वीर्याणि करिष्यतः) = शक्तिशाली कर्मों को करनेवाले (तव) = आपका (तत्) = वह कर्म (प्रवाच्यम्) = प्रकर्षेण स्तुति के योग्य है। बिना ही घोड़े जुते रथ के वे आते हैं और हम सबके लिए जीवन को देते । इस (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली प्रभु के (रातयः) = दान (भद्राः) = हमारे लिए कल्याणकर हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु बिना रथ में जुते घोड़े के ही हमें प्राप्त होते हैं और हमारे लिए जीवन को देनेवाले होते हैं। प्रभु के शक्तिशाली कर्म स्तुति के योग्य हैं। हैं।
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शिव शंकर शर्मा

अनया ऋचा तस्य न्यायं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः। अयं परमात्मा। प्रभङ्गी=दुष्टानां प्रकर्षेण भञ्जयिता। शूरः। मघवा=धनवान्। तुवीमघः=बहुधनः। संमिश्लः=संमिश्रः=सुखदुःखैः यथाकर्म मिश्रयिता। पुनः। वीर्य्याय समर्थः। कमिति पूरणः। तमेव पूजयध्वम्। हे शतक्रतो=अनन्तकर्मन् ! ते=तव। उभा=उभौ। बाहू। वृषणा=वृषणौ वर्षितारौ कामानाम्। या=यौ च। न्यायार्थम्। वज्रं नि मिमिक्षतुः=निगृह्णीतः। ईदृशं त्वामेव वयमुपास्महे ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The lord of immense generosity pervades and rules the world moving on with its own innate law without external imposition. O lord, that divine omnipotence of yours and mighty acts of virile divinity are admirable. Great and good are the gifts of the lord’s charity.