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स॒त्यमिद्वा उ॒ तं व॒यमिन्द्रं॑ स्तवाम॒ नानृ॑तम् । म॒हाँ असु॑न्वतो व॒धो भूरि॒ ज्योतीं॑षि सुन्व॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

satyam id vā u taṁ vayam indraṁ stavāma nānṛtam | mahām̐ asunvato vadho bhūri jyotīṁṣi sunvato bhadrā indrasya rātayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒त्यम् । इर् । वै । ऊँ॒ इति॑ । तम् । व॒यम् । इन्द्र॑म् । स्त॒वा॒म॒ । न । अनृ॑तम् । म॒हान् । असु॑न्वतः । व॒धः । भूरि॑ । ज्योतीं॑षि । सु॒न्व॒तः । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ ॥ ८.६२.१२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:62» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:41» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:12


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - भगवान् (मानुषा) माननीय जातियों तथा (युगा) मास, वर्ष ऋतु आदि कालों को (कृणवत्) बनाता और अपने वश में रखता है। यहाँ दृष्टान्त देते हैं (इव) जैसे (समना) समानमनस्का और मनोहारिणी स्त्री (वपुष्यतः) स्त्रीदेहाभिलाषी पुरुषों को अपने वश में रखती हि, (इन्द्रः) वह भगवान् (तत्+चेतनम्) उस वशीकरण विज्ञान को (विदे) जानता है, (अध+श्रुतः) अतः वह परम प्रसिद्ध है ॥९॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! जैसे ईश्वर अपनी अधीनता में सबको रखता है, तद्वत् अपने आचरणों से सत्पुरुषों को विवश करो ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महान् असुन्वतः वधः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वयं) = हम (तं इन्द्रं) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (सत्यम् इत् वा उ) = सचमुच ही निश्चय से (स्तवाम) = स्तुति करते हैं, (अनृतं न) = झूठ-मूठ नहीं, अर्थात् किसी स्वार्थ के कारण यों ही स्तुति न करके वस्तुतः हृदय से प्रभु का स्तवन कर रहे हैं। [२] जो भी व्यक्ति अपने अन्दर सोम का रक्षण नहीं करता, उस (असुन्वतः) = सोम का अभिषव न करनेवाले व्यक्ति का अथवा अयज्ञशील पुरुष का (वधः) = वध महान् बड़ा है। (सुन्वतः) = सोम का सम्पादन करनेवाले की (भूरि) = बहुत अधिक (ज्योतींषि) = ज्ञानदीप्तियाँ होती हैं। इस (सुन्वन्) = पुरुष के लिए (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की (रातयः) = देन (भद्राः) = कल्याणकर होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन हृदय से करते हैं। यज्ञशील सोमरक्षक पुरुष ही ज्योति को प्राप्त करता है। इसके लिए प्रभु की देन सदा कल्याणकर होती हैं। अगले सूक्त का ऋषि भी 'प्रगाथ काण्व' ही है-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - भगवान्। मानुषा=मानुषान्। युगा=युगानि=कालांश्च स्ववशे। कृणवत्=करोति। अत्र दृष्टान्तः=समनेव। वपुष्यतः=वपुः=स्त्रीशरीरमिच्छतो जनान्। समना= समानमनस्का मनोहारिणीव। इन्द्रः खलु। तत्=चेतनं चेतनाजनकमुत्साहवर्धकम् कर्म। विदे=जानाति सर्वान् वशीकर्तुं जानातीत्यर्थः। अध=अथ श्रुतोऽस्ति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us all worship Indra and adore only truth, never untruth. There is the terrible thunderbolt for the impious uncreators, and profuse lights and showers of bliss for the creators of soma, divine joy and fulfilment for life. Great and gracious are the gifts of Indra.