वांछित मन्त्र चुनें

पौ॒रो अश्व॑स्य पुरु॒कृद्गवा॑म॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्यय॑: । नकि॒र्हि दानं॑ परि॒मर्धि॑ष॒त्त्वे यद्य॒द्यामि॒ तदा भ॑र ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pauro aśvasya purukṛd gavām asy utso deva hiraṇyayaḥ | nakir hi dānam parimardhiṣat tve yad-yad yāmi tad ā bhara ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पौ॒रः । अश्व॑स्य । पु॒रु॒ऽकृत् । गवा॑म् । अ॒सि॒ । उत्सः॑ । दे॒व॒ । हि॒र॒ण्ययः॑ । नकिः॑ । हि । दान॑म् । प॒रि॒ऽमर्धि॑षत् । त्वे इति॑ । यत्ऽय॑त् । यामि॑ । तत् । आ । भ॒र॒ ॥ ८.६१.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:61» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:37» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुवसो) हे बहुधन हे सर्वधन (इन्द्र) हे परमेश ! तू जगत् के कल्याण के लिये (सुतस्य) पवित्र जो मनुष्य हितकारी हो, वैसा (अन्धसः) अन्न (आवृषस्व) चारों तरफ सींच। (हि) निश्चय करके हम (त्वा+विद्म) तुझको जानते हैं कि तू महाधनिक है। क्योंकि (हरिवः) हे संसारवान् ! जो तू संसार का अधीश्वर है और (पृत्सु+सासहिम्) सम्पूर्ण जगत् में दुष्टों का शासन करनेवाला है (अधृष्टम्) तुझको कोई दबा नहीं सकता (दधृष्वणिम्) तू सबको दबा सकता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर ही सब धन का अधिपति है, वही जगत् में सबको सुख पहुँचाता है, वही उपास्यदेव है ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पौर:

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देव) = प्रकाशमय प्रभो! (अश्वस्य) = कर्मों में व्याप्त होनेवाली कर्मेन्द्रियों के आप (पौरः) = पूरयिता (असि) = हैं, (गवाम्) = अर्थों की गमक ज्ञानेन्द्रियों के आप (पुरुकृत्) = पालन व पूरण करनेवाले हैं। आप हमारे लिए (हिरण्ययः उत्सः) = ज्योतिर्मय स्रोत के समान हैं। [२] (त्वे) = आपमें (दानं) = हमारे लिए देय धन (नकिः हि) = नहीं ही (परिमधिषत्) = हिंसित होता, अर्थात् आप सदा हमारे लिए इन धनों को प्राप्त कराते हैं । (यद् यद् यामि) = जो-जो मैं आपसे माँगता हूँ (तद्) = उसे (आभर) = हमारे लिए प्राप्त कराइए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारी ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियों के पूरण को करते हैं-हमारे लिए ज्ञान के स्रोत हैं। जो कुछ हम माँगते हैं, वे सदा देते हैं।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे पुरुवसो=बहुधन=सर्वधन ! हे इन्द्र=परमेश ! त्वम्। सुतस्य+अन्धसः=यज्ञियं पूज्यमन्नम्। येन रोगादिनिवृत्तिः स्यात्। आवृषस्व=जगति=आसिञ्च। हि=निश्चयेन। वयं त्वा विद्म। हे हरिवः=संसारवन् ! कीदृशं त्वा। पृत्सु=पूर्णेषु संसारेषु। सासहिं=दुष्टानामभिभवितारम्। अधृष्टं चित्=कैश्चिदपि न धर्षणीयम्। पुनः। दधृष्वणिम्=अन्येषां धर्षकम् ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You are the sole One omnipresent citizen of the universe, creator of all lands, cows, lights and knowledges of the world, maker of the motions, ambitions, advancements and achievements of nature and humanity, fountain head of universal joy, and golden refulgent generous lord supreme. No one can ever impair or obstruct your gifts to humanity. O lord, I pray, bring us whatever we ask for.