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प्र॒भ॒ङ्गी शूरो॑ म॒घवा॑ तु॒वीम॑घ॒: सम्मि॑श्लो वि॒र्या॑य॒ कम् । उ॒भा ते॑ बा॒हू वृष॑णा शतक्रतो॒ नि या वज्रं॑ मिमि॒क्षतु॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prabhaṅgī śūro maghavā tuvīmaghaḥ sammiślo viryāya kam | ubhā te bāhū vṛṣaṇā śatakrato ni yā vajram mimikṣatuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒ऽभ॒ङ्गी । शूरः॑ । म॒घऽवा॑ । तु॒विऽम॑घः । सम्ऽमि॑श्लः । वी॒र्या॑य । कम् । उ॒भा । ते॒ । बा॒हू इति॑ । वृष॑णा । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । नि । या । वज्र॑म् । मि॒मि॒क्षतुः॑ ॥ ८.६१.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:61» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:39» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:18


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) वह परमात्मा (स्पट्) सबका मन जानता है (उत) और (वृत्रहा) सर्वविघ्ननिवारक है, (परस्पाः) शत्रुओं से बचानेवाला है और (नः+वरेण्यः) हमारा पूज्य स्वीकार्य और स्तुत्य है। (सः+नः+रक्षिषत्) वह हमारी रक्षा करे, (सः+चरमम्) अन्तिम पुत्र या पितामहादि की रक्षा करे, (सः+मध्यमम्) वह मध्यम की रक्षा करे, (सः+नः+पश्चात्) वह हमको पीछे से और (पुरः) आगे से (पातु) बचावे ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे ईश ! तू हमारी सब ओर से रक्षा कर, क्योंकि तू सब पापी और धर्मात्मा को जानता है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'प्रभङ्गी शूरः'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (प्रभङ्गी) = शत्रुओं का भञ्जन करनेवाले, (शूरः) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले, (मघवा) = ऐश्वर्यशाली व (तुवीमघः) = महान् धनवाले हैं। (संमिश्ल:) = उपासकों के साथ सम्यक् मेलवाले वे प्रभु (वीर्याय) = शक्ति के लिए होते हैं और (कम्) = सुख को प्राप्त कराते हैं। [२] हे (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञानवाले प्रभो ! (उभा ते बाहू) = दोनों आपकी भुजाएँ (वृषणा) = सुखों का सेचन करनेवाली हैं, (या) = जो (वज्रं निमिमिक्षतुः) = वज्र को निश्चय से अपने साथ जोड़ती हैं- धारण करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शत्रुओं को शीर्ण करके प्रभु अपने सम्पर्क से हमें शक्तिशाली बनाते हैं। प्रभु की भुजाएँ, शत्रुओं के लिए वज्र को धारण करती हुईं, हमारे पर सुखों का वर्षण करती हैं। प्रभु का गायन करनेवाला 'प्रगाथ काण्व' अगले सूक्त में इन्द्र का स्तवन करता हुआ कहता है-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - इन्द्रः। स्पट्=सर्वस्य ज्ञाताऽस्ति। स्पशतिर्ज्ञानकर्मा। उत=अपि च। वृत्रहास्ति। पुनः। परस्पाः=परेभ्यः शत्रुभ्यः पालयिता। पुनः। नः=अस्माकम्। वरेण्यः=पूज्यः। स नो रक्षिषत्=रक्षतु। स चरममन्तिमम्। स मध्यमञ्च रक्षतु। स नः पश्चात् पातु। पुरः=पुरस्ताच्च पातु ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - A crushing warrior, commanding magnificence, power and universal riches, self-sufficient, virile, joiner of all with karmic destiny, O lord of infinite good actions, both your arms are abundantly generous and hold the thunderbolt of justice, reward and punishment both as deserved.