वांछित मन्त्र चुनें

मा नो॒ रक्ष॒ आ वे॑शीदाघृणीवसो॒ मा या॒तुर्या॑तु॒माव॑ताम् । प॒रो॒ग॒व्यू॒त्यनि॑रा॒मप॒ क्षुध॒मग्ने॒ सेध॑ रक्ष॒स्विन॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mā no rakṣa ā veśīd āghṛṇīvaso mā yātur yātumāvatām | parogavyūty anirām apa kṣudham agne sedha rakṣasvinaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा । नः॒ । रक्षः॑ । आ । वे॒शी॒त् । आ॒घृ॒णि॒व॒सो॒ इत्या॑घृणिऽवसो । मा । या॒तुः । या॒तु॒ऽमाव॑ताम् । प॒रः॒ऽग॒व्यू॒ति । अनि॑राम् । अप॑ । क्षुध॑म् । अग्ने॑ । सेध॑ । र॒क्ष॒स्विनः॑ ॥ ८.६०.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:35» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:20


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (वः+चर्षणीनाम्) तुम मनुष्यों के हित के लिये (अग्निम्) परमात्मा को ही (आहुवेम) हम आवाहन करें, उनकी ही स्तुति प्रार्थना करें। जो मनुष्य (शाश्वतीषु) बहुत भूमियों पर विद्यमान हैं। उन सबके लिये हम ईश्वर की स्तुति करें। जो ईश (अध्रिगुम्) सर्वत्र विद्यमान है और जो (होतारम्) सब कुछ देनेवाला है। हम मनुष्य कैसे हैं, (वृक्तबर्हिषः) दर्भादि होम साधनसम्पन्न पुनः (हितप्रयसः) बहुत अन्नों से युक्त हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - भाव यह है कि जो सदा अग्निहोत्रादि कर्म करते हों और सुखी हों, वे दूसरों की भलाई के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें ॥१७॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'राक्षसी भाव - पीड़ा - दारिद्र्य व भूख' का निराकरण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आघृणीवसो) = समन्तात् ज्ञानरश्मिरूप धनोंवाले प्रभो ! (नः) = हमारे अन्दर (रक्षः) = राक्षसीवृत्ति (मा आवेशीत्) = मत प्रविष्ट हो और (यातुमावताम्) = पीड़ा देनेवालों की (यातुः) = पीड़ा भी (मा) = हमारे अन्दर मत प्रविष्ट हो। ज्ञान से पवित्रता होती है, पवित्रता से पीड़ा का विनाश होता है । [२] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! आप (अनिरां) = अन्नाभावरूप दारिद्र्य को (परोगव्यूतिम्) = कोसों दूर (अपसेध) = निषिद्ध करिये। (क्षुधम्) = भूख को दूर रखिये- हम सदा भूख से न सताये जाएँ। (रक्षस्विनः) = राक्षसी प्रवृत्तियों को भी हमारे से दूर करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानपुञ्ज प्रभु की ज्ञानरश्मियों से दीप्त जीवनवाले बनकर हम राक्षसीभावों व पीड़ाओं से दूर हों । दारिद्र्य-भूख व राक्षसीभाव हमारे से कोसों दूर रहें। जीवनवाला यह तेजस्वी बनता है। सो 'भर्ग:' [तेज] नामवाला होता ज्ञानरश्मियों से दीप्त है। प्रभु का गायन करने से 'प्रागाथ' है। यह 'इन्द्र' नाम से प्रभु का स्मरण करता है।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वयम्। वः=युष्माकम्। चर्षणीनां=मनुष्याणाम्। हिताय। अग्निमग्निमग्निम्। आहुवेम=आह्वयाम=स्तवाम। कीदृशानाम्। शश्वतीषु= बहुषु भूमिषु वर्तमानानाम्। कीदृशमग्निम्। अधृगुम्=अधृतगमनं सर्वत्र विराजमानम्। पुनः। होतारम्=सर्वप्रदातारम्। वयं कीदृशाः। वृक्तबर्हिषः= दर्भादिहोमसाधनसंपन्नाः। पुनः। हितप्रयसः=निहितधनाः प्राप्तसम्पत्तयः ॥१७॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O refulgent lord protector of world’s wealth, let no evil force enter our life, let no violence of the malignant injure us. O lord of light, Agni, cast off starvation, poverty and all demoniac forces far away from us.