यज्ञशील देववृत्तिवाले उपासकों में प्रभु का प्रकाश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (वनेषु) = [वन् संभक्तौ] संभजनशील पुरुषों में (मात्रो:) = ज्ञान व श्रद्धारूप निर्माण करनेवाले [मा] तत्त्वों के होने पर (शेषे) = निवास करते हैं। (त्वा) = आपको (मर्तासः) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले - मन को मार लेनेवाले पुरुष (समिन्धते) = अपने हृदयों में समिद्ध करते हैं। [२] हे प्रभो! आप (हविष्कृतः) = हवि को करनेवाले यज्ञशील पुरुष के (हव्या) = हव्य पदार्थों को (अतन्द्रः) = सब प्रकार की तन्द्रा से रहित हुए हुए वहति प्राप्त कराते हैं। यज्ञशील पुरुष को प्रभु ही यज्ञ के सब साधनों को प्राप्त कराते हैं। (आत् इत्) = अब शीघ्र ही (देवेषु) = देववृत्ति वाले पुरुषों में (राजसि) = दीप्त होते हैं। देववृत्तिवाले पुरुष हृदयों में आपका दर्शन कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का निवास ज्ञान व श्रद्धासम्पन्न उपासकों में होता है। मन को मार लेनेवाले पुरुष प्रभु को अपने में समिद्ध करते हैं। यज्ञशील पुरुषों को प्रभु ही हव्य पदार्थों को प्राप्त कराते हैं। देववृत्ति वाले पुरुषों में प्रभु दीप्त होते हैं।