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न॒हि ते॑ अग्ने वृषभ प्रति॒धृषे॒ जम्भा॑सो॒ यद्वि॒तिष्ठ॑से । स त्वं नो॑ होत॒: सुहु॑तं ह॒विष्कृ॑धि॒ वंस्वा॑ नो॒ वार्या॑ पु॒रु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi te agne vṛṣabha pratidhṛṣe jambhāso yad vitiṣṭhase | sa tvaṁ no hotaḥ suhutaṁ haviṣ kṛdhi vaṁsvā no vāryā puru ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒हि । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । वृ॒ष॒भ॒ । प्र॒ति॒ऽधृषे॑ । जम्भा॑सः । यत् । वि॒ऽतिष्ठ॑से । सः । त्वम् । नः॒ । हो॒त॒रिति॑ । सुऽहु॑तम् । ह॒विः । कृ॒धि॒ । वंस्व॑ । नः॒ । वार्या॑ । पु॒रु ॥ ८.६०.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:34» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:14


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वगत (पावक) हे परमपवित्र हे आत्मसंशोधक (उपमाते) सबके समीप वर्तमान देव ! तू (नः) हम लोगों के लिये (वयोवृधम्) अन्न पशु पुत्रादिक वर्धक और (शंस्यम्) प्रशंसनीय (रयिम्) सम्पत्ति (आ) लाकर दे (च) पुनः (सुनीती) सुनीति द्वारा (पुरुस्पृहम्) बहुप्रिय और (स्वयशस्तरम्) निज यशोवर्धक धन, जन और ज्ञान (नः) हमको (रास्व) दे ॥११॥
भावार्थभाषाः - धन या जन वैसा हो, जो प्रशंसनीय हो अर्थात् लोकोपकारी और उद्योगी हो। जिस धन से अनाथों और असमर्थों की रक्षा न हुई, तो वह किस काम का। धनादिकों की तब ही प्रशंसा हो सकती है, जब उनका सदुपयोग और साहाय्यार्थ हो। बहुत आदमी धन प्राप्त कर उसका उपयोग न जान उससे धर्म के स्थान में अधर्म कमाते हैं ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राष्ट्रयज्ञ का होता राष्ट्रपति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृषभ) = वर्षक (अग्ने) = अग्नि ! (ते) = तेरे (जम्भासः) = दंष्ट्रास्थानीय ज्वालाएँ (नहि प्रतिधृषे) = धर्षण के लिए नहीं होतीं, (यद्) = जब तू (वितिष्ठसे) = रोगकृमिरूप शत्रुओं का सामना करती है। अग्नि की ये ज्वालाएँ शत्रुओं को समाप्त करनेवाली होती हैं। इसी प्रकार एक प्रजा पर सुखों का वर्षण करनेवाले अग्रणी राजा के दंष्ट्रास्थानीय अस्त्र जब शत्रुओं पर आक्रमण करते हैं तो ये धर्षणीय नहीं होते। [२] हे (होतः) = राष्ट्रयज्ञ के संचालक राजन् ! (सः त्वं) = वह तू (नः) = हमारे (हविः) = कर रूप में दिये गये हविरूप धन को (सुहुतं कृधि) = सम्यक् हुत कर, अर्थात् कररूप में दिये गये धन को तू राष्ट्रयज्ञ में सम्यक् विनियुक्त कर । (नः) = हमारे लिए (पुरु) = खूब ही वार्यावरणीय धन को (वंस्व) = देनेवाला हो। राजा राष्ट्र की इस प्रकार व्यवस्था करे कि सब प्रजावर्ग उचित धनों को अजत कर सकें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-राष्ट्रपति के शस्त्र शत्रुओं से धर्षणीय न हों। वह कर का सद्विनियोग करे। प्रजा के लिए उचित व्यवस्था के द्वारा धनों को प्राप्त करानेवाला हो।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! हे पावक=आत्मसंशोधक ! हे उपमाते=समीपस्थ ! “उप समीपे मीयते अनुमीयते सर्वैर्यः स उपमातिः”। त्वं वयोवृधम्=वयसामन्नानां वर्धकम्। शंस्यं=प्रशंसनीयम्। रयिम्=सम्पदम्। नोऽस्मान्। आहरेति शेषः। च=पुनः। सुनीती=सुनीत्या। पुरुस्पृहम्=पुरुभिर्बहुभिः स्पृहणीयम्। स्वयशस्तरम्= अतिशयस्वयशोवर्धकं धनं ज्ञानञ्च। रास्व=देहि ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni when you rise and expand no one can brave your flaming jaws. Pray accept our homage and make it fruitful. Give us ample wealth of our choice and desire.