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देवता: इन्द्र: ऋषि: वत्सः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

ओज॒स्तद॑स्य तित्विष उ॒भे यत्स॒मव॑र्तयत् । इन्द्र॒श्चर्मे॑व॒ रोद॑सी ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ojas tad asya titviṣa ubhe yat samavartayat | indraś carmeva rodasī ||

पद पाठ

ओजः॒ । तत् । अ॒स्य॒ । ति॒त्वि॒षे॒ । उ॒भे इति॑ । यत् । स॒म्ऽअव॑र्तयत् । इन्द्रः॑ । चर्म॑ऽइव । रोद॑सी॒ इति॑ ॥ ८.६.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:6» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

उसका महाबल दिखलाया जाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) सर्वत्र विद्यमान इस इन्द्रवाच्य परमात्मा का (तद्+ओजः१) वह महाबल (तित्विषे) देदीप्यमान होने लगा (यत्) जब (इन्द्रः) परमात्मा ने (उभे) दोनों (रोदसी) परस्पर रोकनेवाले द्युलोक और पृथिवीलोक को (चर्म+इ२व) चर्म के समान (समवर्त्तयत्) अच्छे प्रकार कार्य्य में लगाया अर्थात् जब सर्वकार्य सम्पादित हुआ, तब उसकी शक्ति प्रत्यक्षतया चमकने लगी ॥५॥
भावार्थभाषाः - कार्य से कर्त्ता का ज्ञान होता है, यह सबको प्रत्यक्ष है। जब परमात्मा ने इस सृष्टि का विकाश किया, तब विद्वानों के समीप इसकी महती शक्ति विदित होने लगी। सृष्टि का अद्भुत कौशल देखकर सब ही मोहित हो जाते हैं, ऐसा भगवान् भूतभावन है ॥५॥
टिप्पणी: १−ओज=बल। परमात्मा का बल साक्षात् हम मनुष्यों को विदित नहीं होता, क्योंकि प्रकाशरूप से घटपटादिवत् उसका दर्शन नहीं होता। वह कितना लम्बा, ऊँचा, मोटा है, हम नहीं जानते। जब वेद स्वयं कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् उसके एक पैर बराबर भी नहीं, तब उसकी आकृति का बोध हम जीवों को कैसे हो सकता। तथापि उसकी कृति सृष्टि से उसकी शक्ति का पता लगता है, जिसने यह अनन्त सृष्टि रची है, वह कितना बलधारी होगा, यद्यपि इसका भी अनुमान हम मनुष्यों की बुद्धि में नहीं आ सकता है, तथापि बल के किञ्चित् अंश का ज्ञान हो सकता है। अतः रोदसी का वर्णन आया है। २−चर्म+इव। जैसे कोई पुरुष स्वेच्छया कदाचित् चर्म को विस्तीर्ण, कदाचित् सकुंचित, कदाचित् वेष्टित करके कहीं रख देता है, स्वेच्छया जैसा चाहता है, वैसा उस चर्म से अनायास कार्य लिया करता है, तद्वत् परमात्मा भी इस जगत् को यथेच्छ कार्य में लगाता है, यह दृष्टान्त का आशय है ॥५॥
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आर्यमुनि

अब परमात्मा को तेजस्वी कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस परमात्मा का (तत्, ओजः, तित्विषे) वह तेज दीप्त हो रहा है (यत्) जिस तेज से (इन्द्रः) परमात्मा (उभे, रोदसी) पृथिवी और अन्तरिक्ष इन दोनों को (चर्मेव) चर्म के समान (समवर्तयत्) विस्तीर्ण और संकुचित कर सकता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा को तेजस्वी कथन किया है कि वह अपने तेज प्रभाव से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों में दीप्तिमान् हो रहा है, इसलिये सब प्रजाओं को उचित है कि उसके तेजस्वी भाव को धारण कर ब्रह्मचर्यादि व्रतों से अपने आपको तेजस्वी तथा बलवान् बनावें, क्योंकि बलसम्पन्न पुरुष ही मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त होते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान+शक्ति=ओजस्विता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (चर्म इव) = चर्म की तरह (यत्) = जब (उभे रोदसी) = दोनों द्यावापृथिवी को (समवर्तयत्) = ओढ़ लेता है, मस्तिष्क रूप द्युलोक तथा शरीर रूप पृथिवीलोक दोनों का धारण करता है, (तत्) = तो (अस्य ओजः) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का ओज [शक्ति] (तित्विष) = चमक उठती है। [२] ओजस्विता केवल शरीर की शक्ति से नहीं, अपितु मस्तिष्क के ज्ञान के भी होने पर चमकती है। 'शरीर की शक्ति व मस्तिष्क के ज्ञान' दोनों के ही धारण की आवश्यकता है। ये दोनों सम्मिलित रूप से धारण किये जाने पर इस रूप में हमारे रक्षक होते हैं, जैसे एक ढाल । ढाल के द्वारा योद्धा अपना रक्षण करता है। ये शक्ति व ज्ञान इस उपासक के लिये ढाल का काम देते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर की शक्ति व मस्तिष्क के ज्ञान दोनों को सम्मिलित रूप से धारण करने पर हम ओजस्वी बनते हैं। यह ओजस्विता ही हमारा रक्षण करनेवाली ढाल होती है।
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शिव शंकर शर्मा

तस्योजः प्रदर्श्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - अस्य=सर्वत्र विद्यमानस्येन्द्रस्य। तत्=तदा। ओजो बलम्। तित्विषे=दिदीपे=प्रत्यक्षतया चकाशे। त्विष दीप्तौ। यद्=यदा। इन्द्रः। उभे=द्वे अपि। रोदसी=परस्पररोधयित्र्यौ द्यावापृथिव्यौ। चर्मेव। समवर्त्तयत्=कार्ये यथारुचि न्ययोजयत्। अयमाशयः। यथा−कश्चित् पुरुषः स्वेच्छया कदाचित् चर्म वेष्टयित्वा कुत्रापि स्थापयति कदाचिद् विस्तारयति, कदाचित् तेन किमपि मानं करोति। एवं विधानि कार्य्याणि यथेच्छं करोति। तद्वत् परमात्मापि यथेच्छं जगदिदं कार्य्ये परिणमयति यदा च सर्वं कार्य्यजातं सम्पादितं तदा तस्य शक्तिर्दिदीप इत्यर्थः ॥५॥
भावार्थभाषाः -
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आर्यमुनि

अथ परमात्मनः स्वप्रकाशत्वं कथ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) अस्य परमात्मनः (तत्, ओजः, तित्विषे) तादृशं तेजः दीप्यते (यत्) येन (इन्द्रः) परमात्मा (उभे, रोदसी) द्वे अपि द्यावापृथिव्यौ (चर्मेव) चर्मवत् (समवर्तयत्) विस्तारयितुं संकोचयितुं च शक्नोति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When Indra, lord almighty, pervades and envelops both heaven and earth in the cover of light, the light that shines is only the lord’s divine splendour that blazes with glory.