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देवता: इन्द्र: ऋषि: वत्सः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

न द्याव॒ इन्द्र॒मोज॑सा॒ नान्तरि॑क्षाणि व॒ज्रिण॑म् । न वि॑व्यचन्त॒ भूम॑यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

na dyāva indram ojasā nāntarikṣāṇi vajriṇam | na vivyacanta bhūmayaḥ ||

पद पाठ

न । द्यावः॑ । इन्द्र॑म् । ओज॑सा । न । अ॒न्तरि॑क्षाणि । व॒ज्रिण॑म् । न । वि॒व्य॒च॒न्त॒ । भूम॑यः ॥ ८.६.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:6» मन्त्र:15 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:15


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शिव शंकर शर्मा

ईश्वर की महान् महिमा दिखलाई जाती है।

पदार्थान्वयभाषाः - (द्यावः) द्युलोक अर्थात् जिस स्थान में सूर्य्य, ग्रह आदि रहते हैं, वे लोक (ओजसा) अपने बल से (इन्द्रम्) परमदेवता को (न+विव्यचन्त) वश में नहीं कर सकते अर्थात् इन्द्र द्युलोक से भी अधिक ओजस्वी है। इसी प्रकार (अन्तरिक्षाणि) अन्तरिक्ष=आकाश लोक भी (वज्रिणम्) उस दण्डधर परमात्मा को (न) अपने वश में नहीं कर सकते तथा (भूमयः+न) एतद् भूमि सदृश अनन्त भूमियाँ भी इसको बल से व्याप्त नहीं कर सकती हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - जो इन्द्र जिस द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूमि को उत्पन्न करता और पालता है, वे उसको अपने वश में कैसे कर सकते हैं। वह सबसे अधिक बलिष्ठ और ओजस्वितम है ॥१५॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिणम्, इन्द्रम्) उस वज्रशक्तिवाले परमात्मा को (ओजसा) पराक्रम से (न, द्यावः) न द्युलोक (न, अन्तरिक्षाणि) न अन्तरिक्षलोक (न, भूमयः) न भूलोक (विव्यचन्त) अतिक्रमण कर सकते हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - उस वज्रशक्तिसम्पन्न परमात्मा को कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता और न उसको कोई विचलित कर सकता है। वह सब राजाओं का महाराजा, सब दिव्यशक्तियों का चालक, सब लोक-लोकान्तरों का ईशिता, सबको प्राणनशक्ति देनेवाला और सम्पूर्ण धन-धान्य तथा ऐश्वर्य्यों का स्वामी है, उसकी आज्ञा का पालन करना ही जीवन और उससे विमुख होना मृत्यु है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पादोऽस्य विश्वा भूतानि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (द्यावः) = ये द्युलोक (ओजसा) = अपनी ओजस्विता से (न विव्यचन्त) = [व्यच समवाये] घेर नहीं पाते। (वज्रिणम्) = उस वज्रहस्त प्रभु को (न अन्तरिक्षाणि) = ना ही अन्तरिक्षलोक [विव्यचन्त = ] घेर पाते हैं। प्रभु इन द्युलोक व अन्तरिक्ष लोकों से बहुत बड़े हैं, ये तो प्रभु के एक देश में स्थित हैं । [२] (भूमयः) = ये पृथिवीलोक भी (न विव्यचन्त) = उस प्रभु को नहीं घेर सकते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु त्रिलोकी से बहुत विशाल हैं ये तीनों लोक प्रभु के एकदेश में स्थित हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना - यहाँ 'द्यावः, अन्तरिक्षाणि, भूमयः' ये बहुवचनान्त प्रयोग कई सौर लोकों के होने की सूचना दे रहे हैं।
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शिव शंकर शर्मा

ईशस्य महान् महिमा प्रदर्श्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - यथा। द्यावः=द्युलोकाः सूर्य्यचन्द्रग्रहादिस्थानानि। यद्वा। अस्मात्सूर्य्यादपि उपरितनलोका द्यौशब्देन व्यवह्रियन्ते। ता द्यावः। वज्रिणम्=महादण्डधारिणम्। इन्द्रम्=परमदेवम्। न=कदापि। ओजसा=बलेन। विव्यचन्त=वशीकर्तुं शक्नुवन्ति। तथा। अन्तरिक्षाणि=अन्तर्मध्ये द्यावापृथिव्योर्मध्ये यानि स्थानानि ईक्ष्यन्ते अवलोक्यन्ते तानि अन्तरिक्षाणि। तं वशीकर्त्तुं न शक्नुवन्ति। तथा। भूमयः=एतद् भूमिसमाना अनन्ता अपि भूमयः। न तं विव्यचन्त=व्याप्नुवन्ति ॥१५॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिणम्, इन्द्रम्) वज्रशक्तिमन्तं परमात्मानम् (ओजसा) पराक्रमेण (न, द्यावः) द्युलोकाः न (अन्तरिक्षाणि, न) अन्तरिक्षलोकान् (न, भूमयः) भूलोका न (विव्यचन्त) व्याप्नुवन्ति ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Neither heavens nor the middle regions nor earths with all their lustre and power can violate, comprehend or even contain Indra, lord of the thunderbolt of omnipotence, justice and punishment.