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इन्द्रा॑वरुणा॒ यदृ॒षिभ्यो॑ मनी॒षां वा॒चो म॒तिं श्रु॒तम॑दत्त॒मग्रे॑ । यानि॒ स्थाना॑न्यसृजन्त॒ धीरा॑ य॒ज्ञं त॑न्वा॒नास्तप॑सा॒भ्य॑पश्यम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāvaruṇā yad ṛṣibhyo manīṣāṁ vāco matiṁ śrutam adattam agre | yāni sthānāny asṛjanta dhīrā yajñaṁ tanvānās tapasābhy apaśyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑वरुणा । यत् । ऋ॒षिऽभ्यः॑ । म॒नी॒षाम् । वा॒चः । म॒तिम् । श्रु॒तम् । अ॒द॒त्त॒म् । अग्रे॑ । यानि॑ । स्थाना॑नि । अ॒सृ॒ज॒न्त॒ । धीराः॑ । य॒ज्ञम् । त॒न्वा॒नाः । तप॑सा । अ॒भि । अ॒प॒श्य॒म् ॥ ८.५९.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:59» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:31» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तप से ज्ञान व उत्कृष्ट लोकों की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्रावरुणा) = जितेन्द्रियता व निर्देषता के दिव्यभावो ! आप (यत्) = जिस (मनीषां) = बुद्धि को (वाचा) = ज्ञान की वाणियों को, मतिं मननशक्ति को तथा (श्रुतं) = शास्त्रज्ञान को (ऋषिभ्यः) = ' अग्निवायु, आदित्य व अङ्गिरा' आदि ऋषियों के लिए (अग्रे) = सृष्टि के प्रारम्भ में (अदत्तम्) = देते हो। मैं भी (तपसा) = तप के द्वारा (अपश्यम्) = उन ज्ञानों का द्रष्टा बनूँ। [२] (यज्ञं तन्वानाः) = यज्ञों का विस्तार करते हुए (धीराः) = बुद्धि में रमण करनेवाले ज्ञानी पुरुष (यानि स्थानानि) = जिन उत्तम लोकों को (असृजन्त) = सृष्ट करते हैं- प्राप्त करते हैं, मैं भी तप के द्वारा उन लोकों को प्राप्त करनेवाला बनूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-तप के द्वारा मैं ज्ञान को प्राप्त करूँ। यह तप मुझे उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करानेवाला
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Varuna, divine powers of vigour and intelligence, judgement and imagination, what words of knowledge and thoughts of wisdom by virtue of meditation, study and speech you gave to the sages of vision earlier, and what orders of discovery and invention through yajnic extension of research, the patient, persistent sages achieved later, all these, with my austere discipline of study and application, let me see and realise for myself.