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इ॒मानि॑ वां भाग॒धेया॑नि सिस्रत॒ इन्द्रा॑वरुणा॒ प्र म॒हे सु॒तेषु॑ वाम् । य॒ज्ञेय॑ज्ञे ह॒ सव॑ना भुर॒ण्यथो॒ यत्सु॑न्व॒ते यज॑मानाय॒ शिक्ष॑थः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imāni vām bhāgadheyāni sisrata indrāvaruṇā pra mahe suteṣu vām | yajñe-yajñe ha savanā bhuraṇyatho yat sunvate yajamānāya śikṣathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मानि॑ । वा॒म् । भा॒ग॒ऽधेया॑नि । सि॒स्र॒ते॒ । इन्द्रा॑वरुणा । प्र । म॒हे । सु॒तेषु॑ । वा॒म् । य॒ज्ञेऽय॑ज्ञे । ह॒ । सव॑ना । भु॒र॒ण्यथः॑ । यत् । सु॒न्व॒ते । यज॑मानाय । शिक्ष॑थः ॥ ८.५९.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:59» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:30» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रावरुणा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्रावरुणा) = जितेन्द्रियता व निर्देषता के दिव्यभावो ! (इमानि) = ये शरीर में उत्पन्न सोमकण (वां) = आपके (भागध्यानि) = भाग होते हुए (प्र सिस्रते) = शरीर के अंग-प्रत्यंगों में गतिवाले होते हैं। हे इन्द्रावरुण! मैं (सुतेषु) = इन सोमकणों का सम्पादन होने पर (वाम्) = आपको महे पूजता हूँ। जितेन्द्रियता व निर्देषता का पूजन ही इन सोमकणों को शरीर में सुरक्षित करता है। [२] हे इन्द्रावरुण! आप (यज्ञे यज्ञे) = प्रत्येक यज्ञ में (ह) = निश्चय से (सवना) = ऐश्वर्यों का (भुरण्यथः) = भरण करते हो। (यत्) = जब (सुन्वते यजमानाय) = शरीर में सोम का अभिषव करनेवाले यज्ञशील पुरुष के लिए आप (शिक्षथः) = शक्ति को प्राप्त कराने की कामनावाले होते हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जितेन्द्रिय व निद्वेष बनकर शरीर में सोम का रक्षण करें इससे यज्ञशील बनकर ऐश्वर्यशाली व प्रभु के पूजक बनें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Varuna, power and judgement of divinity, these are your contributions to life which in this grand yajna of human life vibrate in the yajnic projects of life inspired by you: In every yajna of life you energise and shine the holy activities when you bless and inspire the yajamana who creates and contributes to the joy of life.