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अ॒यं वां॑ भा॒गो निहि॑तो यजत्रे॒मा गिरो॑ नास॒त्योप॑ यातम् । पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तम॒स्मे प्र दा॒श्वांस॑मवतं॒ शची॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ vām bhāgo nihito yajatremā giro nāsatyopa yātam | pibataṁ somam madhumantam asme pra dāśvāṁsam avataṁ śacībhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । वा॒म् । भा॒गः । निऽहि॑तः । य॒ज॒त्रा॒ । इ॒माः । गिरः॑ । ना॒स॒त्या॒ । उप॑ । या॒त॒म् । पिब॑तम् । सोम॑म् । मधु॑ऽमन्तम् । अ॒स्मे इति॑ । प्र । दा॒श्वांस॑म् । अ॒व॒त॒म् । शची॑भिः ॥ ८.५७.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:57» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मधुमान् सोम का पान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यजत्रा) = संगतिकरण द्वारा त्राण करनेवाले प्राणापानो! (अयं) = यह (वां) = आपका (भागः) = भाग (निहित:) = स्थापित हुआ है। यह सोम आपका ही भाग है, आपको इसका सेवन करना है। हे (नासत्या) = असत्य से रहित प्राणापानो । (इमाः गिरः) = इन ज्ञान की वाणियों को (उपयातम्) = समीपता से प्राप्त होओ। प्राणसाधना से सोमरक्षण द्वारा बुद्धि की तीव्रता होकर इन ज्ञान की वाणियों का ग्रहण होता है। [२] हे प्राणापानो! आप (अस्मे) = हमारे लिए (मधुमन्तं सोमं) = जीवन को अतिशयेन मधुर बनानेवाले सोम का (पिबतं) = पान करो। (दाश्वांसम्) = आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाले को (शचीभिः) = प्रज्ञानों व कर्मों के द्वारा (प्र अवतम्) = प्रकर्षेण रक्षित करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणापान सोम का रक्षण करते हैं, ज्ञान की वाणियों को प्राप्त होते हैं, सोमपान द्वारा प्रज्ञानों व कर्मों का रक्षण करते हैं। इस प्राणसाधना से होनेवाले सोमरक्षण से सब दिव्यगुणों का विकास होता है। सो अगले सूक्त का देवता 'विश्वेदेवाः' है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of knowledge, adorable guides worthy of association and cooperation, this part of our yajnic pursuit of knowledge and development is reserved for you. O seekers of truth, committed to truth, come and listen to what we have to say, share and enjoy the soma pleasure of the honey sweets of peaceful advancements in knowledge, and with your powers and blessed actions protect and promote the generous and committed yajaka who surrenders to you in faith and obedience.