वांछित मन्त्र चुनें

यु॒वां दे॒वास्त्रय॑ एकाद॒शास॑: स॒त्याः स॒त्यस्य॑ ददृशे पु॒रस्ता॑त् । अ॒स्माकं॑ य॒ज्ञं सव॑नं जुषा॒णा पा॒तं सोम॑मश्विना॒ दीद्य॑ग्नी ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvāṁ devās traya ekādaśāsaḥ satyāḥ satyasya dadṛśe purastāt | asmākaṁ yajñaṁ savanaṁ juṣāṇā pātaṁ somam aśvinā dīdyagnī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यु॒वाम् । दे॒वाः । त्रयः॑ । ए॒का॒द॒शासः॑ । स॒त्याः । स॒त्यस्य॑ । द॒दृ॒शे॒ । पु॒रस्ता॑त् । अ॒स्माक॑म् । य॒ज्ञम् । सव॑नम् । जु॒षा॒णा । पा॒तम् । सोम॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । दीद्य॑ग्नी॒ इति॒ दीदि॑ऽअग्नी ॥ ८.५७.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:57» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवों व महादेव का दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (युवां) = आप दोनों को (त्रयः एकादशासः) = तीन गुणा ग्यारह, अर्थात् (तैंतीस सत्याः देवाः) = सत्य देव (सत्यस्य पुरस्तात्) = उस सत्यस्वरूप प्रभु से पूर्व ददृशे देखते हैं। प्राणसाधना के होने पर जीवन में पहले ३३ देवों का प्रकाश होता है और तदनन्तर प्रभु की ज्योति का दर्शन होता है। प्राणसाधना हमारे जीवन में दिव्यगुणों का वर्धन करती हुई हमें प्रभु को समीप प्राप्त कराती है। [२] हे प्राणापानो! आप (अस्माकं) = हमारे (यज्ञं सवनं) = यज्ञमय प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवन व तृतीय सवन का (जुषाणा) = सेवन करते हुए (सोमं पातं) = सोम का रक्षण करो और इस प्रकार (दीद्यग्नी) = देदीप्यमान ज्ञानाग्निवाले होओ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से दिव्यभावों का वर्धन होकर अन्ततः प्रभु का दर्शन होता है। सोम का रक्षण होकर ज्ञानाग्नि का दीपन होता है।
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of the light of knowledge, thirty-three divinities, eternally true, have revealed to you the truth of their reality. Friendly and loving, brilliant as the light and fire of Agni, come to our yajna, taste, protect and promote the soma of our yajnic endeavour for further progress than before.