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अचे॑त्य॒ग्निश्चि॑कि॒तुर्ह॑व्य॒वाट् स सु॒मद्र॑थः । अ॒ग्निः शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ बृ॒हत्सूरो॑ अरोचत दि॒वि सूर्यो॑ अरोचत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

acety agniś cikitur havyavāṭ sa sumadrathaḥ | agniḥ śukreṇa śociṣā bṛhat sūro arocata divi sūryo arocata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अचे॑ति । अ॒ग्निः । चि॒कि॒तुः । ह॒व्य॒ऽवाट् । सः । सु॒मत्ऽर॑थः । अ॒ग्निः । शु॒क्रेण॑ । शो॒चिषा॑ । बृ॒हत् । सूरः॑ । अ॒रो॒च॒त॒ । दि॒वि । सूर्यः॑ । अ॒रो॒च॒त॒ ॥ ८.५६.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:56» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हव्यवाट् सुमद्रथः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र के अनुसार वेदवाणी को प्राप्त करनेवाला (अचेति) = चेतनावाला होता है। यह (अग्निः) = प्रगतिशील व्यक्ति (चिकितुः) = ज्ञानी बनता है, (हव्यवाट्) = हव्य का वहन करनेवाला अर्थात् यज्ञशील होता है । (सः) = वह (सुमद्रथः) = प्रशस्त शरीररूप रथवाला होता है। वह (अग्निः) = प्रगतिशील व्यक्ति (शुक्रेण शोचिषाः) = देदीप्यमान ज्ञानज्योति से (बृहत्) = खूब अरोचत चमकता है। [२] (सूर:) = यह सूर्य के समान होता है। इसके (दिवि) = मस्तिष्करूप द्युलोक में (सूर्य:) = ज्ञान का सूर्य (अरोचतः) = चमक उठता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वेदवाणी के अध्ययन से हम चेतनावाले होकर हव्य का ही सेवन करते हैं। उत्तम शरीररूप रथवाले बनकर देदीप्यमान ज्ञानज्योति से सूर्य की तरह चमक उठते हैं। ज्ञान से अपने जीवन को पवित्र करनेवला वह व्यक्ति 'मेध्य' नामवाला होता है-ज्ञानज्योति से चमकनेवाला 'काण्व' बनता है। यह प्राणापान की साधना करता हुआ 'अश्विनौ' का आराधन करता हुआ कहता है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is self-conscious, enlightens and, self- conducted on its own waves of radiation, carries the fragrance of yajnic havi as well as the light of knowledge from the vedi all round. Agni, brave and expansive like space shines with the flames of fire and purity and blazes with splendour like the sun in heaven.