सु॒दे॒वाः स्थ॑ काण्वायना॒ वयो॑वयो विच॒रन्त॑: । अश्वा॑सो॒ न च॑ङ्क्रमत ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
sudevāḥ stha kāṇvāyanā vayo-vayo vicarantaḥ | aśvāso na caṅkramata ||
पद पाठ
सु॒ऽदे॒वाः । स्थ॒ । का॒ण्वा॒य॒नाः॒ । वयः॑ऽवयः । वि॒ऽच॒रन्तः॑ । अश्वा॑सः । न । च॒ङ्क्र॒म॒त॒ ॥ ८.५५.४
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:55» मन्त्र:4
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:26» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुदेव व काण्वायन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीवो! तुम (सुदेवाः स्थ) = उत्तम माता-पिता व आचार्यरूप देवों को प्राप्त हुए हो, अतएव (काण्वायनाः) = अतिशयेन मेधावी बने हो। (वयः वयः) = आयुष्य के पहले प्रयाण से दूसरे प्रयाण में, दूसरे से तीसरे में तथा तीसरे से चौथे प्रयाण में (विचरन्तः) = विचरण करते हुए होओ। ब्रह्मचर्य से गृहस्थ में, गृहस्थ से वानप्रस्थ में और वहाँ से संन्यास में। [२] इस प्रकार (अश्वासः न) = अश्वों की तरह (चङ्क्रमत) = खूब ही गतिवाले होओ और आगे और आगे बढ़ते हुए लक्ष्य पर पहुँचनेवाले बनो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उत्तम माता, पिता व आचार्यों को पाकर हम ज्ञानी बनें। जीवन के प्रयाणों में घोड़ों के समान आगे और आगे बढ़ते हुए हम लक्ष्य स्थान पर पहुँचें।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Celebrants of knowledge and wisdom, teachers and students, be good, generous and brilliant, go on strong and stronger, moving and rising higher and higher like real men of ambition.
