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नक्ष॑न्त॒ इन्द्र॒मव॑से सुकृ॒त्यया॒ येषां॑ सु॒तेषु॒ मन्द॑से । यथा॑ संव॒र्ते अम॑दो॒ यथा॑ कृ॒श ए॒वास्मे इ॑न्द्र मत्स्व ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nakṣanta indram avase sukṛtyayā yeṣāṁ suteṣu mandase | yathā saṁvarte amado yathā kṛśa evāsme indra matsva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नक्ष॑न्ते । इन्द्र॑म् । अव॑से । सु॒ऽकृ॒त्यया॑ । येषा॑म् । सु॒तेषु॑ । मन्द॑से । यथा॑ । स॒म्ऽव॒र्ते । अम॑दः । यथा॑ । कृ॒शे । ए॒व । अ॒स्मे इति॑ । इ॒न्द्र॒ । म॒त्स्व॒ ॥ ८.५४.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:54» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

संवर्त+कृश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (येषां) = जिनके (सुतेषु) = उत्पन्न किये गये सोमकणों में अथवा यज्ञों में [सुत-सव - यज्ञ] (मन्दसे) = आप आनन्दित होते हैं। जो सोमरक्षण द्वारा अथवा यज्ञों द्वारा आपको आनन्दित करते हैं, वे (सुकृत्यया) = शुभकर्मों के द्वारा अवसे रक्षण के लिए (इन्द्रं नक्षन्ते) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को-आपको प्राप्त होते हैं। [२] हे प्रभो ! (यथा) = जैसे (संवर्ते) = इन्द्रियों व मन को विषयों से हटा कर प्रत्याहत करनेवाले मनुष्य में आप (अमदः) = हृषत होते हो, (यथा) = जैसे (कृशे) = भोगविलास से दूर रहते हुए तपःकृश व्यक्ति में आप आनन्दित होते हो, हे इन्द्र ! (एवा) = इसी प्रकार (अस्मे) = हमारे मैं (मत्स्व) = आप आनन्दित होइये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को उत्तम कर्मों के द्वारा हम प्राप्त होते हैं। प्रभु हमारा रक्षण करते हैं। प्रभु को वे व्यक्ति प्रीणित करते हैं जो यज्ञशील हैं, इन्द्रियों को विषयों से प्रत्याहृत करनेवाले हैं तथा भोगविलास से दूर रहकर तपःकृश जीवन बिताते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, the people, in whose realised strength and joy you delight, obtain honour and grace by their noble action. We pray just as you take delight in the acts of the self-controlled man and appreciate the limitations of the attenuated, so accept and cherish whatever homage we are able to offer for protection and grace.