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आ॒जि॒तुरं॒ सत्प॑तिं वि॒श्वच॑र्षणिं कृ॒धि प्र॒जास्वाभ॑गम् । प्र सू ति॑रा॒ शची॑भि॒र्ये त॑ उ॒क्थिन॒: क्रतुं॑ पुन॒त आ॑नु॒षक् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ājituraṁ satpatiṁ viśvacarṣaṇiṁ kṛdhi prajāsv ābhagam | pra sū tirā śacībhir ye ta ukthinaḥ kratum punata ānuṣak ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒जि॒ऽतुर॑म् । सत्ऽप॑तिम् । वि॒श्वऽच॑र्षणिम् । कृ॒धि । प्र॒ऽजासु॑ । आऽभ॑गम् । प्र । सु । ति॒र॒ । शची॑भिः॒ । ये । ते॒ । उ॒क्थिनः॑ । क्रतु॑म् । पु॒न॒ते । आ॒नु॒षक् ॥ ८.५३.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:53» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:23» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्तोत्रों व यज्ञों' द्वारा शक्तिवर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (आजितुरं कृधि) = हमें संग्राम में शत्रुओं का संहार करनेवाला बनाइये । (सत्पतिं) = सज्जनों का रक्षक व (विश्वचर्षणिं) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला, अर्थात् स्वार्थवृत्ति से ऊपर उठकर परार्थवृत्तिवाला बनाइये । आप हमें (प्रजासु आभगम्) = सब प्रजाओं में सब प्रकार से ऐश्वर्यवाला बनाइये। [२] हे प्रभो ! (ये) = जो (ते) = आपके (उक्थिनः) = स्तोता हैं और जो (आनुषक्) = निरन्तर (क्रतुं पुनते) = यज्ञों को पवित्र करते हैं, अर्थात् यज्ञों के द्वारा पवित्र जीवनवाले होते हैं, उन्हें (शचीभिः) = शक्तियों के द्वारा (सु) = सम्यक् (प्रतिर) = बढ़ाइये । स्तोत्र व यज्ञ हमें शक्तिशाली बनाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तोत्रों व यज्ञों से शक्तिवर्धन होता है। हम संग्रामविजयी व ऐश्वर्यशाली बनते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Create among the people and their coming generations that power, prosperity and grandeur which gives victory and progress, protects and promotes truth and the good people, and which is universally good, positive and creative. With your noble powers and actions help and save those who are your celebrants and perform noble yajnic actions in your honour with love and faith.