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विश्वा॒ द्वेषां॑सि ज॒हि चाव॒ चा कृ॑धि॒ विश्वे॑ सन्व॒न्त्वा वसु॑ । शीष्टे॑षु चित्ते मदि॒रासो॑ अं॒शवो॒ यत्रा॒ सोम॑स्य तृ॒म्पसि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvā dveṣāṁsi jahi cāva cā kṛdhi viśve sanvantv ā vasu | śīṣṭeṣu cit te madirāso aṁśavo yatrā somasya tṛmpasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वा॑ । द्वेषां॑सि । ज॒हि । च॒ । अव॑ च॒ । आ । कृ॒धि॒ । विश्वे॑ । स॒न्व॒न्तु॒ । आ । वसु॑ । शीष्टे॑षु । चि॒त् । ते॒ । म॒दि॒रासः॑ । अं॒शवः॑ । यत्र॑ । सोम॑स्य । तृ॒म्पसि॑ ॥ ८.५३.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:53» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निर्देषता व उल्लास

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे इन्द्र ! (यत्रा) = जहाँ (सोमस्य तृम्पसि) = तू सोम से तृप्ति का अनुभव करता है, वहाँ (विश्वा) = सब (द्वेषांसि) = द्वेषो को जहि विनष्ट कर, (च) = और (अवकृधि) = सब द्वेषों को हमारे से दूर कर । सोमरक्षण से द्वेषादि की वृत्तियाँ उत्पन्न ही नहीं होती। [२] इस सोमरक्षण से (विश्वे) = सब (वसु) = धन (आ सन्वन्तु) = तुझे प्राप्त हों। ये (अंशवः) = सोमकण (शीष्टेषु) = शिष्ट पुरुषों में (चित्ते मदिरासः) = हृदय में उल्लास को पैदा करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से निर्देषता प्राप्त होती है और हृदयों में उल्लास होता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, divine soul, destroy all hate and enmities, protect the yajamana and others, do good, let all create all wealth and joys of the world in the heart of the educated and cultured where you drink and enjoy the exhilarating draughts of soma.