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य आ॒युं कुत्स॑मतिथि॒ग्वमर्द॑यो वावृधा॒नो दि॒वेदि॑वे । तं त्वा॑ व॒यं हर्य॑श्वं श॒तक्र॑तुं वाज॒यन्तो॑ हवामहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya āyuṁ kutsam atithigvam ardayo vāvṛdhāno dive-dive | taṁ tvā vayaṁ haryaśvaṁ śatakratuṁ vājayanto havāmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । आ॒युम् । कुत्स॑म् । अ॒ति॒थि॒ऽग्वम् । अर्द॑यः । व॒वृ॒धा॒नः । दि॒वेऽदि॑वे । तम् । त्वा॒ । व॒यम् । हरि॑ऽअश्वम् । श॒तऽक्र॑तुम् । वा॒ज॒ऽयन्तः॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ ८.५३.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:53» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'आयु-कुत्स-अतिथिग्व-हर्यश्व व शतक्रतु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (आयुं) = गतिशील पुरुष को, (कुत्सं) = वासनाओं का संहार करनेवाले को, (अतिथिग्वं) = उस महान् अतिथि प्रभु की ओर जानेवाले को (अर्दयः) = प्राप्त होते हैं [अर्द गतौ ], जो (दिवे-दिवे) = प्रतिदिन (वावृधान:) = हमारा खूब ही वर्धन करनेवाले हैं, (तं त्वा) = उन आपको (वयं) = हम (हवामहे) = पुकारते हैं। आपके अनुग्रह से ही तो हम 'आयु, कुत्स व अतिथिग्व' बन पाते हैं। [२] हम (वाजयन्तः) = शक्ति को प्राप्त करने की कामनावाले होते हुए (हर्यश्व्वं) = तेजस्वी इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले, (शतक्रतुं) = अनन्त प्रज्ञान व शक्तिवाले प्रभु को पुकारते हैं। प्रभु के अनुग्रह से हम 'हर्यश्व व शतक्रतु' बन पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का आराधन करते हुए हम 'आयु, कुत्स, अतिथिग्व, हर्यश्व व शतक्रतु' बनें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Seekers of food and energy, honour and excellence, and advancement and success in life, we pray to you, lord of a hundred great acts of holiness, commander of the dynamic forces of achievement, you who give life, thunderbolt of power and justice, and the spirit of hospitality to people while you lead them on the path of progress day by day.