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यस्य॒ त्वमि॑न्द्र॒ स्तोमे॑षु चा॒कनो॒ वाजे॑ वाजिञ्छतक्रतो । तं त्वा॑ व॒यं सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहो॑ जुहू॒मसि॑ श्रव॒स्यव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasya tvam indra stomeṣu cākano vāje vājiñ chatakrato | taṁ tvā vayaṁ sudughām iva goduho juhūmasi śravasyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑ । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । स्तोमे॑षु । चा॒कनः॑ । वाजे॑ । वा॒जि॒न् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । तम् । त्वा॒ । व॒यम् । सु॒दुघा॑म्ऽइव । गो॒ऽदुहः॑ । जु॒हू॒मसि॑ । श्र॒व॒स्यवः॑ ॥ ८.५२.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:52» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:20» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तुति-शक्ति-ज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (यस्य) = जिसके (स्तोमेषु) = स्तुतिवचनों में (त्वं) = आप (चाकनः) = कामनावाले होते हैं- जिसके स्तुतिवचन आपके लिए कान्त होते हैं। हे (वाजिन्) = शक्तिसम्पन्न (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञानवाले प्रभो ! जिसके (वाजे) = बल में आप कामनावाले होते हैं, अर्थात् जिसे आप सबल बनाने का अनुग्रह करते हैं, अर्थात् आप ही हमें स्तुतिप्रवण व शक्तिशाली बनाते हैं। [२] (तं त्वा) = उन आपको (वयं) = हम (श्रवस्यवः) = ज्ञान व यशस्वी जीवन की कामनावाले होते हुए इस प्रकार (जुहूमसि) = पुकारते हैं, जैसे (गोदुहः) = गोधुक् [गोप] लोग दुग्धदोहन के लिए (सुदुघाम्) = उत्तमता से दौड़ने योग्य गौ को । आपसे हमें उत्तम ज्ञानदुग्ध प्राप्त होता है, जिसने हमें परिपुष्ट, पवित्र व यशस्वी बनाना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के अनुग्रह से हम स्तुतिप्रवण, शक्तिसम्पन्न व ज्ञान के पिपासु बनें। शरीर में शक्ति, मस्तिष्क में ज्ञान व मन में हमारे स्तुति की भावना हो ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In whose hymns of adoration and victorious deeds you delight, O hero of a hundred grand deeds and victory, the same we, seekers of sustenance, honour and fame, invoke, you Indra, and pray for blessings as milkmen love and treat a generous cow for the gift of milk.