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देवता: इन्द्र: ऋषि: आयुः काण्वः छन्द: बृहती स्वर: मध्यमः

य उ॒क्था केव॑ला द॒धे यः सोमं॑ धृषि॒तापि॑बत् । यस्मै॒ विष्णु॒स्त्रीणि॑ प॒दा वि॑चक्र॒म उप॑ मि॒त्रस्य॒ धर्म॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ukthā kevalā dadhe yaḥ somaṁ dhṛṣitāpibat | yasmai viṣṇus trīṇi padā vicakrama upa mitrasya dharmabhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । उ॒क्था । केव॑ला । द॒धे । यः । सोम॑म् । धृ॒षि॒ता । अपि॑बत् । यस्मै॑ । विष्णुः॑ । त्रीणि॑ । प॒दा । वि॒ऽच॒क्र॒मे । उप॑ । मि॒त्रस्य॑ । धर्म॑ऽभिः ॥ ८.५२.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:52» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उप मित्रस्य धर्मभिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (केवला:) = आनन्द में संचार करानेवाले (उक्था) = स्तोत्रों को (दधे) = धारण करता है, अर्थात् प्रभु का स्तवन करता हुआ आनन्द में विचरता है । (यः) = जो (धृषिता) = शत्रुओं के काम, क्रोध आदि के- धर्षण के द्वारा (सोमं) = सोम को (अपिबत्) = पीता है, अर्थात् शरीर में सोम का रक्षण करता है। [२] (यस्मै) = जिसके लिए (विष्णुः) = वह सबमें व्यापक रहनेवाला परमात्मा (त्रीणि पदा) = तीन कदमों को विचक्रमे रखता है, अर्थात् जो प्रभुस्मरण करता हुआ शरीर, मन व बुद्धि के स्वास्थ्य को प्राप्त करता है, वह (मित्रस्य धामभिः) = सूर्य के तेजों से युक्त हुआ हुआ (उप) = उस प्रभु के समीप होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्तवनों में आनन्द लें, काम, क्रोध को जीतकर सोम का शरीर में रक्षण करें, प्रभु के अनुग्रह से शरीर, मन व बुद्धि का विकास करें। तभी हम सूर्य सम तेजों को धारण करते हुए प्रभु के समीप होंगे।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who loves and accepts only the pure, original, un-interpolated hymns of the Veda, who is keen for victory worthy of the brave and cherishes the joy of that ecstatic ambition, for whom Vishnu, lord omnipresent, energises the three orders of earth, skies and heaven in existence, out of love for him in the cosmic law, that is Indra, the divine soul.