पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जिस प्रकार हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (पृषध्रे) = शक्ति सेचन के द्वारा अपना धारण करनेवाले में, (मेध्ये) = यज्ञों में उत्तम, अर्थात् यज्ञशील पुरुष में, (मातरिश्वनि) = वेदमाता के अनुसार गति द्वारा वृद्धि को प्राप्त करनेवाले व (सोमं सुवाने) = सोम का सम्पादन करनेवाले में (अमन्दथा:) = आप आनन्द को करते हो, अर्थात् इन 'पृषध्र' आदि को प्रभु आनन्दित करते हैं। [२] (यथा) = जिस प्रकार (दशशिप्रे) = दस शिरस्त्राणोंवाले में, अर्थात् दसों इन्द्रियों को सुरक्षित रखनेवाले में, (दशोण्ये) = दसों इन्द्रियों के मलों को दूर करनेवाले में [ओण् अपनयने], (स्यूमरश्मौ) = आनन्दकर ज्ञानरश्मियोंवाले में तथा (ऋजूनसि) = ऋजु [सरल] मार्ग से गति करते हुए दुःखों का परिहाण [ऊन् परिहाणे] करनेवाले में आनन्दित करते हैं। इसी प्रकार हमारे जीवनों में सोमरक्षण द्वारा आनन्द को करनेवाले होइये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'पृषध्र, मेध्य, मातरिश्वा, सोमसवन करनेवाले, दशशिप्र दशोण्य, स्यूनरश्मि, ऋजूनस्' बनकर आनन्दित हों।