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समिन्द्रो॒ रायो॑ बृह॒तीर॑धूनुत॒ सं क्षो॒णी समु॒ सूर्य॑म् । सं शु॒क्रास॒: शुच॑य॒: सं गवा॑शिर॒: सोमा॒ इन्द्र॑ममन्दिषुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sam indro rāyo bṛhatīr adhūnuta saṁ kṣoṇī sam u sūryam | saṁ śukrāsaḥ śucayaḥ saṁ gavāśiraḥ somā indram amandiṣuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । इन्द्रः॑ । रायः॑ । बृ॒ह॒तीः । अ॒धू॒नु॒त॒ । सम् । क्षो॒णी इति॑ । सम् । ऊँ॒ इति॑ । सूर्य॑म् । सम् । शु॒क्रासः॑ । शुच॑यः । सम् । गोऽआ॑शिरः । सोमाः॑ । इन्द्र॑म् । अ॒म॒न्दि॒षुः॒ ॥ ८.५२.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:52» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:21» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:10


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु ही ऐश्वर्य के प्रेरक हैं

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (बृहतीः रायः) = वृद्धि के कारणभूत धनों को (सम् अधूनुत) = [Promoted] हमारी ओर प्रेरित करते हैं। वे प्रभु ही (क्षोणी) = पृथिवी को संप्रेरित करते हैं, (उ) = और (सूर्यं) = सूर्य को संप्रेरित करते हैं। [२] (शुचयः) = जीवन को पवित्र बनानेवाले (शुक्रास:) = वीर्यकण (इन्द्रम्) = इस परमैश्वर्यशाली प्रभु को (सम् अमन्दिषुः) = आनन्दित करते हैं। वीर्यकणों की रक्षा करनेवाला पुरुष प्रभु का प्रिय बनता है। ये (गवाशिरः) = इन्द्रियों के मलों का संहार करनेवाले (सोमाः) = सोमकण प्रभु को आनन्दित करते हैं। जब उपासक सोमकणों के रक्षण के द्वारा इन्द्रियों को सशक्त व निर्मल बनाता है, तो यह प्रभु का प्रिय होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब ऐश्वर्यों को हमारी ओर प्रेरित करते हैं। प्रभु ही पृथिवी व सूर्य को गति देते हैं। सोमरक्षक पुरुष प्रभु का प्रिय बनता है। जीवन को पवित्र बनानेवाला 'मेध्य काण्व' अगले सूक्त का ऋषि है। यह इन्द्र की उपासना इस प्रकार करता है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let Indra, divine soul, chant and liberate the grand abundance of spontaneous divine hymns in honour of Indra, let the earth and heaven resound, let the hymns reach the sun. Let the pure, powerful and sanctified soma abundance of divine celebration please Indra, lord omnipotent and omnificent.