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क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुषे॑ । उपो॒पेन्नु म॑घव॒न्भूय॒ इन्नु ते॒ दानं॑ दे॒वस्य॑ पृच्यते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kadā cana starīr asi nendra saścasi dāśuṣe | upopen nu maghavan bhūya in nu te dānaṁ devasya pṛcyate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क॒दा । च॒न । स्त॒रीः । अ॒सि॒ । न । इ॒न्द्र॒ । स॒श्च॒सि॒ । दा॒शुषे॑ । उप॑ऽउप । इत् । नु । म॒घ॒ऽव॒न् । भूयः॑ । इत् । नु । ते॒ । दान॑म् । दे॒वस्य॑ । पृ॒च्य॒ते॒ ॥ ८.५१.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:51» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:7


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सदा 'सर्वद' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! आप कदाचन कभी भी (स्तरी:) = हमारी हिंसा करनेवाले (न) = नहीं है अथवा आप हमारे लिए [वन्ध्य] गौ के समान नहीं है- आप हमारे लिए सदा आवश्यक वस्तु रूप दुग्ध को प्राप्त करानेवाले हैं। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिए- दानशील पुरुष के लिए (सश्चसि) = प्राप्त होनेवाले हैं। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (देवस्य ते) = सब कुछ देनेवाले आपका (इत् नु) = निश्चय से (भूयः दानं) = खूब दान (उप उप इत् नु) = समीप और अत्यन्त समीप ही (पृच्यते) = हमारे साथ से संपृक्त होता है। हम आपके दानों का पात्र बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें निरन्तर आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त कराते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Never are you unfruitful, never unchari-table, you are always with the giver, closer and closer, more and more, again and again, O lord of wealth and honour, and the charity of divinity ever grows higher and promotes the giver.