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यस्मा॑ अ॒र्कं स॒प्तशी॑र्षाणमानृ॒चुस्त्रि॒धातु॑मुत्त॒मे प॒दे । स त्वि१॒॑मा विश्वा॒ भुव॑नानि चिक्रद॒दादिज्ज॑निष्ट॒ पौंस्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasmā arkaṁ saptaśīrṣāṇam ānṛcus tridhātum uttame pade | sa tv imā viśvā bhuvanāni cikradad ād ij janiṣṭa pauṁsyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्मै॑ । अ॒र्कम् । स॒प्तऽशी॑र्षाणम् । आ॒नृ॒चुः । त्रि॒ऽधातु॑म् । उ॒त्ऽत॒मे । प॒दे । सः । तु । इ॒मा । विश्वा॑ । भुव॑नानि । चि॒क्र॒द॒त् । आत् । इत् । ज॒नि॒ष्ट॒ । पौंस्य॑म् ॥ ८.५१.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:51» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मोक्षपद की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्मा) = जिस प्रभु के लिए (अर्कम्) = पूजा के साधनभूत वेदमन्त्रों [अर्चन्ति अनेन] से, जो वेदमन्त्र (सप्तशीर्षाणम्) = सप्त छन्दोरूप सात सिरोंवाले हैं तथा (त्रिधातुम्) = शरीर, मन व बुद्धि तीनों का धारण करनेवाले हैं, उन मन्त्रों से (आनृचः) = पूजन करते हैं और (उत्तमे पदे) = सर्वोत्तम मोक्षपद का लाभ करते हैं। (सः) = वे प्रभु ही (तु) = तो (इमा) = इन (विश्वा) = सब (भुवनानि) = लोगों को (चिक्रदद्) = इस मोक्षपद के लिए आहूत करते हैं। हृदयस्थरूपेण उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा करते हैं। [२] जब हम इस प्रेरणा को आह्वान को सुनते हैं (आत् इत्) = तब ही शीघ्र (पौंस्यं जनिष्ट) = शक्ति उत्पन्न होती है। अपने अन्दर शक्ति का सम्पादन करके यह उपासक निरन्तर आगे बढ़ता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वेदमन्त्रों द्वारा प्रभुपूजन करें। प्रभुप्रेरणा को सुनते हुए ठीक मार्ग पर चलते हुए मोक्षपद की ओर बढ़ें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - To do honour to Indra, people adore the seven- rayed sun in high heaven who lights and sustains three worlds of heaven, earth and the middle regions. He creates all regions of the universe and thus reveals his power and generosity.