पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यथा) = जैसे (मनौ) = विचारशील पुरुष में, (सांवरणौ) = अपना सम्यक् आच्छादन करनेवाले पुरुष में (सुतं सोमं अपिब:) = उत्पन्न हुए हुए सोम को आप पीते हो, अर्थात् इस सोम को शरीर में ही व्याप्त करते हों। इसी प्रकार हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (नीपातिथौ) = [नीप= Deep] उस गम्भीर आपको अतिथि बनानेवाले में (सचा) = समवेत होकर सोम का पान करते हैं। सोम का रक्षण उस व्यक्ति में होता है जो 'विचारशील-अपना रक्षण करनेवाला व प्रभु का आतिथ्य करनेवाला' होता है। [२] इसी प्रकार हे प्रभो ! आप (मेध्यातिथौ) = पवित्र प्रभु का आतिथ्य करनेवाले में, (पुष्टिगौ) = पुष्ट इन्द्रियोंवाले में, तथा (श्रुष्टिगौ) = समृद्ध व सानन्द इन्द्रियोंवाले में समवेत होकर आप सोम का पान करते हैं, अर्थात् यह ('मेध्यातिथि = पुष्टिगु व श्रुष्टिगु') = पुरुष प्रभु का उपासन करता हुआ सोम का रक्षण कर पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'मनु- सांवरणि-नीपतिथि-मेध्यातिथि - पुष्टिगु व श्रुष्टिगु' बनकर प्रभु का उपासन करते हुए सोम का रक्षण करें।