पदार्थान्वयभाषाः - [१] ये प्राणापान (मंहिष्ठा) = हमारे लिये दातृतम हैं, सर्वोत्तम दाता हैं, गत मन्त्र के अनुसार सब वसुओं को देनेवाले हैं। (वाजसा तमा) = शक्ति को प्राप्त करानेवालों में सर्वोत्तम हैं। प्राणसाधना से वीर्य की ऊर्ध्वगति होकर शक्ति बढ़ती ही है। (इषयन्ता) = ये हमारे लिये प्रभु-प्रेरणा की कामनावाले होते हैं। प्राणसाधना से हृदय निर्मल होता है, इस निर्मल हृदय में प्रभु प्रेरणा सुनाई पड़ती है। इस प्रकार ये (शुभस्पती) = हमारे जीवनों में शुभ कार्यों के, सौन्दर्य के रक्षक होते हैं। [२] ये प्राणापान (दाशुषः) = दाश्वान् के, देने की वृत्तिवाले के, त्यागशील के (गृहम्) = शरीररूप गृह को (गन्तारा) = प्राप्त होनेवाले हैं। त्यागवृत्ति से विपरीत भोगवृत्ति होती है। इस वृत्ति में प्राणापान की क्षीणता होती है। ये इस भोगी के शरीर गृह को छोड़ जाते हैं। प्राणसाधना के साथ युक्ताहार- विहार अत्यन्त आवश्यक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना शरीर में सब आवश्यक वसुओं की स्थापना करती है, शक्ति को देती है, हमें प्रभु प्रेरणा को सुनने योग्य बनाती है, हमारे में शुभ का रक्षण करती है। इस साधना में भोगवृत्ति नितरां विघातक है।