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आ नो॑ द्यु॒म्नैरा श्रवो॑भि॒रा रा॒या या॑तमश्विना । पुरु॑श्चन्द्रा॒ नास॑त्या ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no dyumnair ā śravobhir ā rāyā yātam aśvinā | puruścandrā nāsatyā ||

पद पाठ

आ । नः॒ । द्यु॒मैः । आ । श्रवः॑ऽभिः । आ । रा॒या । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । पुरु॑ऽचन्द्रा । नास॑त्या ॥ ८.५.३२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:5» मन्त्र:32 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:32


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी विषय को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुश्चन्द्रा) हे बहुसुवर्ण हे बहुतों के आह्लादक ! (नासत्या) हे असत्यरहित सत्यस्वभाव (अश्विना) राजन् तथा मन्त्रिमण्डल ! आप दोनों (द्युम्नैः) विज्ञानों के साथ (नः) हमारे निकट (आयातम्) आवें (श्रवोभिः) यशों के साथ (आ) आवें (राया) गवादि धन के साथ (आ) आवें ॥३२॥
भावार्थभाषाः - देश में सर्वविध धनों को पैदा करवाने की चेष्टा राजा करे ॥३२॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुश्चन्द्रा, नासत्या) हे अत्यन्त आह्लादक सत्यभाषिन् (अश्विना) व्यापक ! (नः) हमारे समीप आप (द्युम्नैः) दिव्य विद्याओं सहित (आ) आवें तथा (श्रवोभिः) श्रवणीय यशसहित (आ) आवें (राया) विविध धनों सहित (आयातम्) आइये ॥३२॥
भावार्थभाषाः - हे आह्लादक तथा सत्यभाषणशील ! आप दिव्य ज्ञानवाले, यशस्वी तथा विविध धनों के स्वामी हैं। आप कृपा करके अपने उक्त सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों सहित आवें और हमारे यज्ञ को सुशोभित करें ॥३२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्ति-ज्ञान-धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = कर्मों में व्याप्त होनेवाले प्राणापानो! आप (नः) = हमें (घुम्नैः आयातम्) = शक्तियों के साथ (आयातम्) = प्राप्त होवो। [द्युम्नं-energy, strength, power ] । हे (पुरुश्चन्द्रा) = खूब ही आह्लादित करनेवाले प्राणापानो! आप (श्रवोभिः) = ज्ञानों के साथ [ आ ] हमें प्राप्त होवो। वस्तुतः ज्ञान के द्वारा ही आप अविद्यान्धकार को व वासनाओं को विनष्ट करके हमें आनन्दित करते हो। [२] हे (नासत्या) = सब असत्यों को दूर करनेवाले प्रभो! आप (राया) = धनों के साथ [आ] हमें प्राप्त होवो। वस्तुतः प्राणसाधना को करते हुए हम पवित्र साधनों से ही धनों को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना हमें शक्ति, ज्ञान व धनों को प्राप्त कराती है। इस से हम 'कर्मशील [अश्विना], आनन्दमय [ पुरुश्चन्द्रा] व सत्यशील [न सत्या] ' बनते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे पुरुश्चन्द्रा=पुरुश्चन्द्रौ। चन्द्र इति सुवर्णनाम। पुरवो बहवश्चन्द्रा ययोस्तौ बहुकनकौ। यद्वा। पुरूणां बहूनां चन्द्रावाह्लादकौ। हे नासत्या=नासत्यौ=असत्यरहितौ। हे अश्विना=अश्विनौ=राजानौ। युवाम्। द्युम्नैर्द्योतमानैर्विज्ञानैः। नोऽस्मानायातम्। श्रवोभिर्यशोभिः। आयातम्। राया=पश्वादिधनेन सह। आयातम् ॥३२॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुश्चन्द्रा, नासत्या) हे अत्यन्ताह्लादकौ सत्यभाषिणौ (अश्विना) व्यापकौ ! (नः) अस्मान् (द्युम्नैः) द्योतमानविद्याभिः (आ) आगच्छतम् (श्रवोभिः) यशोभिश्च (आ) आगच्छतम् (राया) धनेन च (आयातम्) आगच्छतम् ॥३२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, observers and protectors of truth, blest with grace and glory of universal character, come to us with lights of knowledge, honour and wealth of imperishable value.