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रथं॒ हिर॑ण्यवन्धुरं॒ हिर॑ण्याभीशुमश्विना । आ हि स्थाथो॑ दिवि॒स्पृश॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rathaṁ hiraṇyavandhuraṁ hiraṇyābhīśum aśvinā | ā hi sthātho divispṛśam ||

पद पाठ

रथ॑म् । हिर॑ण्यऽवन्धुरम् । हिर॑ण्यऽअभीशुम् । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । हि । स्थाथः॑ । दि॒वि॒ऽस्पृश॑म् ॥ ८.५.२८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:5» मन्त्र:28 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:28


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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्य कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे अश्वयुक्त राजा और नायकादिवर्ग ! आप दोनों (हिरण्यबन्धुरम्) जिसके सब बन्धन सोने के हैं। (हिरण्याभीशुम्) जिसका लगाम सुवर्ण का है (दिविस्पृशम्) जो आकाशस्पर्शी है (रथम्) ऐसे रथ पर सदा (आ+स्थाथः) बैठकर जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ शीघ्र जाया करें ॥२८॥
भावार्थभाषाः - प्रजाओं की रक्षा के लिये राजा सदा सन्नद्ध रहे ॥२८॥
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आर्यमुनि

अब उक्त दोनों का यान द्वारा विचरना कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे व्यापकशक्तिवाले ! आप (हिरण्यवन्धुरम्) सुवर्णमय ऊँचे-नीचे (हिरण्याभीशुम्) सुवर्णमय शृङ्खलाओं से बद्ध (दिविस्पृशम्) अत्यन्त ऊँचे आकाश में चलनेवाले (रथम्) यान पर (हि) निश्चय करके (आस्थाथः) चढ़नेवाले हैं ॥२८॥
भावार्थभाषाः - हे व्यापकशक्तिशील ! आप निश्चय करके यान द्वारा आकाश में विचरनेवाले हैं, जो यान ऊपर-नीचे सुवर्णमय शृङ्खलाओं से बँधा हुआ है ॥२८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'हिरण्यवन्धु-हिरण्याभीशु-दिविस्पृश्' रथ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अश्विना) = हे प्राणापानो! आप (रथम्) = उस शरीर रथ पर (हि) = निश्चय से (आस्थाथः) = अधिष्ठित होते हो जो (दिविस्पृशम्) = प्रकाश का स्पर्श करनेवाला है, प्रकाशमय है। शरीर रथ में बुद्धि ही विद्युद्दीप का काम करती है, प्राणापान ही इस बुद्धि को बड़ा तीव्र बनाते हैं। [२] प्राणापान उस शरीर-रथ पर स्थित होते हैं जो (हिरण्यवन्धुरम्) = ज्योतिर्मय व सुन्दर है, ज्योति के कारण बड़ा सुन्दर है और (हिरण्याभीशुम्) = हितरमणीय मनरूप लगामवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से यह शरीर रथ 'ज्योतिर्मय सुन्दर, उत्तम मन रूप लगामवाला तथा बुद्धि के कारण उज्ज्वल' बनता है।
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शिव शंकर शर्मा

राजकर्त्तव्यमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना=अश्विनौ ! युवाम्। हिरण्यबन्धुरम्= हिरण्यबन्धनम्। हिरण्याभीशुम्=कनकप्रग्रहम्। दिविस्पृशमाकाशस्पर्शिनमत्युच्चरथम्। हि=निश्चयेन। आस्थाथः=अधितिष्ठथः। ततो यत्रावश्यकता तत्र शीघ्रं गन्तव्यमित्यर्थः ॥२८॥
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आर्यमुनि

अथोभयोर्विचरणं कथ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे व्यापकौ ! (हिरण्यवन्धुरम्) सुवर्णमयमुन्नतानतम् (हिरण्याभीशुम्) सुवर्णशृङ्खलम् (दिविस्पृशम्) आकाशगामिनम् (रथम्) यानम् (हि) निश्चयम् (आस्थाथः) आरोहतः ॥२८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, you ride a chariot of golden structure and golden control which flies and touches the borders of the regions of light on high.