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यु॒वं कण्वा॑य नासत्या॒ ऋपि॑रिप्ताय ह॒र्म्ये । शश्व॑दू॒तीर्द॑शस्यथः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvaṁ kaṇvāya nāsatyā ṛpiriptāya harmye | śaśvad ūtīr daśasyathaḥ ||

पद पाठ

यु॒वम् । कण्वा॑य । ना॒स॒त्या॒ । अपि॑ऽरिप्ताय । ह॒र्म्ये । शश्व॑त् । ऊ॒तीः । द॒श॒स्य॒थः॒ ॥ ८.५.२३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:5» मन्त्र:23 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:23


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शिव शंकर शर्मा

राजा गृहादिकों की रक्षा करे, यह उपदेश देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे असत्यरहित राजन् तथा मन्त्रिमण्डल ! (हर्म्ये) स्वभवन में (अपिरिप्ताय) चौरादिकों से पीड़ित (कण्वाय) विद्वान् पुरुष को (युवम्) आप दोनों स्वयं जाकर (शश्वत्) सर्वदा (ऊतीः) रक्षाएँ (दशस्यथः) करें ॥२३॥
भावार्थभाषाः - राजा को प्रत्येक गृह की वार्ता जाननी चाहिये और तदनुसार उसका यथोचित प्रबन्ध करे ॥२३॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे नासत्य ! (युवं) आप (हर्म्ये) गृह में स्थित (अपिरिक्ताय) शत्रुओं से सताये हुए (कण्वाय) विचारशील विद्वान् की (शश्वत्) सदैव (ऊतीः) रक्षा (दशस्यथः) करते हैं ॥२३॥
भावार्थभाषाः - “न सत्यौ असत्यौ न असत्यौ नासत्यौ”=जो कभी भी असत्य न बोलें, उनका नाम “नासत्य” है। हे सत्यवादी ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन् ! गृह में स्थित अर्थात् कोई अपराध न करते हुए शत्रुओं से सताये जाने पर आप विद्वानों की सदैव रक्षा करने के कारण पूज्य=सत्कारयोग्य हैं, कृपा करके हमारी भी दुष्ट पुरुषों से सदैव रक्षा करें ॥२३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सब दोषों से बचाव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (नासत्या) = असत्यों को दूर करनेवाले प्राणापानो! (युवम्) = आप (हर्म्ये) = इस शरीर गृह में (अपिरिप्ताय) = शतशः वासनाओं व रोगों से पीड़ित (कण्वाय) = मेधावी पुरुष के लिये (शश्वत्) = सदा (ऊती:) = रक्षणों को (दशस्यथः) = देते हो। [२] प्राणसाधना ही मेधावी पुरुष को रोगों व वासनाओं से बचाती है। प्राणसाधना के अभाव में एक पुरुष रोगों व वासनाओं से आक्रान्त होता ही रहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणापान 'नासत्या' हैं। वे इस शरीर में हमें वासनाओं व रोगों से आक्रान्त नहीं होने देते।
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शिव शंकर शर्मा

गृहरक्षादिराजकर्त्तव्यतामुपदिशति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे नासत्या=नासत्यावसत्यरहितौ राजानौ ! हर्म्ये=स्वभवने। अपिरिप्ताय=चौरादिभिः पीडिताय। कण्वाय=विदुषे पुरुषाय। युवम्=युवाम्। स्वयं गत्वा। शश्वत्=शाश्वतीः। ऊतीः=रक्षाः। दशस्यथः=दत्थः कुरुथः ॥२३॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) हे नासत्यौ ! (युवं) युवां (हर्म्ये) गृहे (अपिरिप्ताय) शत्रुभिर्बाधिताय (कण्वाय) विदुषे (शश्वत्) सदैव (ऊतीः) रक्षाः (दशस्यथः) कुरुथः ॥२३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, observers and protectors of truth without fail, you always provide protection for the oppressed man of knowledge and wisdom in his home.