'गोमन् - सुवीर - सुरथ' रयि
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (नः) = हमारे लिये (रयिं आवोढम्) = उस ऐश्वर्य को प्राप्त कराओ, जो (गोमन्तम्) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाला है, (सुवीरम्) = उत्तम सन्तानोंवाला है तथा (सुरथम्) = प्रशस्त शरीर-रथवाला है। प्राणसाधक धन को प्राप्त करता है, परन्तु उसके जीवन में इस धन का घातक प्रभाव नहीं होता। यह धन उसे भोग-विलास में फँसाकर उसकी इन्द्रियों को जीर्ण करनेवाला नहीं होता। इस धन से उसकी सन्तानें कुत्सित प्रभावों से आक्रान्त नहीं हो जाती और उसका यह शरीर ठीक बना रहता है। [२] हे प्राणापानो! आप हमें (अश्वावती:) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियोंवाली (इषः) = प्रेरणाओं को प्राप्त कराओ। प्राणसाधना से हमारी कर्मेन्द्रियाँ उत्तम बनें और प्रभु प्रेरणा के अनुसार कार्यों को करनेवाली हों। वह धन प्राप्त होता है जो हमारी इन्द्रियों, सन्तानों व शरीररूप
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से हमें रथों को उत्तम बनाता है। हमारी कर्मेन्द्रियाँ भी उत्तम बनती हैं और प्रभु-प्रेरणा के अनुसार चलती हैं ।