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अ॒ने॒हसं॑ प्र॒तर॑णं वि॒वक्ष॑णं॒ मध्व॒: स्वादि॑ष्ठमीं पिब । आ यथा॑ मन्दसा॒नः कि॒रासि॑ न॒: प्र क्षु॒द्रेव॒ त्मना॑ धृ॒षत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anehasam prataraṇaṁ vivakṣaṇam madhvaḥ svādiṣṭham īm piba | ā yathā mandasānaḥ kirāsi naḥ pra kṣudreva tmanā dhṛṣat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ने॒हस॑म् । प्र॒ऽतर॑णम् । वि॒वक्ष॑णम् । मध्वः॑ । स्वादि॑ष्ठम् । ई॒म् । पि॒ब॒ । आ । यथा॑ । म॒न्द॒सा॒नः । कि॒रासि॑ । नः॒ । प्र । क्षु॒द्राऽइ॑व । त्मना॑ । धृ॒षत् ॥ ८.४९.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:49» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अनेहसं प्रतरणं विवक्षणम्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीव ! तू (ईम्) = निश्चय से (मध्वः) = जीवन को मधुर बनानेवाले सोम के (स्वादिष्ठं) = अतिशयेन मधुर रस को (पिब) = पी। यह रस (अनेहसं) = तुझे निष्पाप बनानेवाला हैं, (प्रतरणं) = सब रोगों व वासनाओं से तरानेवाला है, (विवक्षणं) = विशिष्टरूप से उन्नत करनेवाला है। [२] प्रभु कहते हैं कि हे जीव! तू (न:) = हमारे इस सोमरस को (मन्दसानः) = उल्लास का अनुभव करता हुआ (यथा) = जैसे-जैसे (आकिरासि) = शरीर में चारों ओर विकीर्ण करनेवाला होता है, तो (त्मना) = स्वयम् (क्षुद्रा इव) = वासना आदि प्रबल शत्रुओं को भी तुच्छ शत्रुओं की तरह (प्रधृषत्) = अभिभूत करता है। इन वासनारूप शत्रुओं का कुचलना तेरे लिए आसान हो जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में सुरक्षित सोम हमें निष्पाप, रोगों व वासनाओं को तैरनेवाला व उन्नतिशील बनाता है । सोमरक्षक पुरुष उल्लसित होकर प्रबल शत्रुओं को भी आसानी से जीत लेता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of joy and fulfilment, pray accept the innocent, overflowing, inspiring song of adoration, enjoy it like a draught of soma sweeter than honey, so that happy and joyous at heart and soul, ignoring all minor considerations, you may pour out your gifts of generosity like showers of mist.