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श॒तानी॑केव॒ प्र जि॑गाति धृष्णु॒या हन्ति॑ वृ॒त्राणि॑ दा॒शुषे॑ । गि॒रेरि॑व॒ प्र रसा॑ अस्य पिन्विरे॒ दत्रा॑णि पुरु॒भोज॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śatānīkeva pra jigāti dhṛṣṇuyā hanti vṛtrāṇi dāśuṣe | girer iva pra rasā asya pinvire datrāṇi purubhojasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श॒तानी॑काऽइव । प्र । जि॒गा॒ति॒ । धृ॒ष्णु॒ऽया । हन्ति॑ । वृ॒त्राणि॑ । दा॒शुषे॑ । गि॒रेःऽइ॑व । प्र । रसाः॑ । अ॒स्य॒ । पि॒न्वि॒रे॒ । दत्रा॑णि । पु॒रु॒ऽभोज॑सः ॥ ८.४९.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:49» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे (त्रातारः) हे रक्षको ! (देवाः) हे विद्वानो ! आप सब मिलकर (नः+अधिवोचत) हम अशिक्षित मनुष्यों को अच्छे प्रकार सिखला दीजिए, जिससे (निद्राः+मा+नः+ईशत) निद्रा, आलस्य, क्रोधादि दुर्गुण हमारे प्रभु न बन जाएँ (उत) और (जल्पिः) निन्दक पुरुष भी (मा+नः) हमारी निन्दा न करें (विश्वह) सब दिन (वयम्) हम (सोमस्य+प्रियासः) परमात्मा के प्रिय बने रहें और (सुवीरासः) सुवीर होकर (विदथम्) विज्ञान का (आ+वदेम) उपदेश करें या अपने गृह में रहकर आपकी स्तुति प्रार्थना करें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - हम लोग समय-२ पर विद्वानों से उपदेश ग्रहण करें, ताकि आलस्यादि दोष न आने पावें और ईश्वर के प्रिय सदा बने रहें ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अनन्तशक्ति- अनन्तदान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (धृष्णुया) = शत्रुओं के धर्षण के हेतु से शतानीका इव सैंकड़ों सैन्यों के समान (प्रजिगाति) = ये प्रभु गति करते हैं। सैंकड़ों सेनाएँ भी वह शत्रुसंहार कार्य नहीं कर पातीं, जो इस प्रभु द्वारा सम्पन्न हो जाता है। ये प्रभु दाशुषे दाश्वान् पुरुष के लिए प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले पुरुष के लिए वृत्राणि हन्ति - ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को विनष्ट करते हैं। [२] गिरेः= पर्वत से प्रवाहित होनेवाले रसाः इव रसों के समान अस्य इस पुरुभोजसः = खूब ही पालन करनेवाले प्रभु के दत्राणि दान प्रपिन्विरे प्रजाओं का पोषण करते हैं। इस शक्ति भावार्थ- प्रभु अपने प्रति अर्पण करनेवाले के लिए अनन्तशक्ति प्रदान करते हैं, से उपासक वासनारूप शत्रुओं का विनाश करता है। प्रभु के दान उपासक का पोषण करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे त्रातारो देवाः ! नोऽस्मानधिवोचत=अधिकं ब्रूत शिक्षध्वम्। येन। निद्राः। नोऽस्मान्। मा ईशत=वयमलसा मा भूम। उत अपि च। जल्पिर्निन्दकः। नोऽस्मान् मा निन्दतु। वयम्। विश्वह=सर्वेषु अहःसु। सोमस्य=ईश्वरस्य। प्रियासः=प्रिया भवेम। सुवीरासः=सुवीराः सन्तः। विदथं=विज्ञानं आवदेम=आभिमुख्येन वदेम ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the commander of a hundred armies, with his power and force, Indra rushes forward to fight and win, and he destroys the demons of darkness and want for the charitable giver. The gifts of this universal giver of food and sustenance feed and support humanity like streams flowing down from the mountains.